ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही ड्रेस कोड को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कॉलेज प्रशासन द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों में छात्राओं के लिए परिसर के कई प्रमुख स्थानों पर शॉर्ट्स पहनकर आने पर रोक लगा दी गई है। इस फैसले के बाद छात्रों और छात्र संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है और इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश बताया है।
किन जगहों पर लागू होगा ड्रेस कोड?
कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो. सुज़न एलियास की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार छात्राएं अब क्लासरूम, ट्यूटोरियल रूम, प्रयोगशाला, असेंबली हॉल, लाइब्रेरी और डाइनिंग हॉल में शॉर्ट्स पहनकर प्रवेश नहीं कर सकेंगी। कॉलेज प्रशासन का कहना है कि यह नियम परिसर में अनुशासन और शैक्षणिक माहौल बनाए रखने के उद्देश्य से लागू किया गया है।
सिर्फ ड्रेस कोड नहीं, कई नए नियम भी लागू
कॉलेज प्रशासन ने ड्रेस कोड के साथ-साथ कई अन्य नियम भी लागू किए हैं। पूरे परिसर को स्मोक-फ्री ज़ोन घोषित किया गया है और धूम्रपान करने वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। इसके अलावा छात्रों को परिसर में स्वच्छता बनाए रखने, कचरा केवल निर्धारित डस्टबिन में डालने और हर समय अपना कॉलेज आईडी कार्ड साथ रखने का निर्देश दिया गया है।
छात्रों ने बताया 'मोरल पुलिसिंग'
कॉलेज के कई छात्रों का कहना है कि ये नियम उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अनावश्यक दखल हैं। कुछ छात्रों ने इसे मोरल पुलिसिंग करार दिया है। द्वितीय वर्ष की एक छात्रा ने कहा कि कॉलेज प्रशासन को ड्रेस कोड पर ध्यान देने के बजाय शिक्षा की गुणवत्ता, शोध और छात्रों की शैक्षणिक सुविधाओं को बेहतर बनाने पर अधिक जोर देना चाहिए।
NSUI ने भी जताया विरोध
इस फैसले का विरोध करते हुए NSUI ने भी कॉलेज प्रशासन की आलोचना की है। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के कपड़े पहनने, अपनी जीवनशैली चुनने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। उन्होंने कहा कि आज की Gen Z पीढ़ी संवैधानिक मूल्यों में विश्वास करती है और किसी भी प्रकार की मोरल पुलिसिंग को स्वीकार नहीं करेगी। उनके अनुसार, इस तरह के नियम छात्रों के अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर असर डालते हैं।
बहस का बना नया विषय
सेंट स्टीफंस कॉलेज का यह फैसला अब सोशल मीडिया और शैक्षणिक हलकों में भी चर्चा का विषय बन गया है। एक पक्ष इसे अनुशासन बनाए रखने की दिशा में उठाया गया कदम बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे व्यक्तिगत आज़ादी पर प्रतिबंध मान रहा है। फिलहाल कॉलेज प्रशासन ने अपने फैसले में किसी बदलाव का संकेत नहीं दिया है। वहीं, छात्र संगठनों का कहना है कि यदि नियमों पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो वे आगे भी विरोध जारी रखेंगे।
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