ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम समझौते को लेकर एक नई शर्त जोड़ दी है। ट्रंप ने कहा है कि यह समझौता तभी अंतिम रूप ले सकेगा, जब सऊदी अरब Abraham Accords के तहत इजरायल के साथ अपने राजनयिक संबंध सामान्य करेगा। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब एक दिन पहले ही अमेरिका और सऊदी अरब के बीच इस डील की घोषणा की गई थी, लेकिन उसमें इस शर्त का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।
डील के बाद अचानक सामने आई नई शर्त
सिविल न्यूक्लियर डील की घोषणा के समय न तो अमेरिका के ऊर्जा विभाग और न ही सऊदी अरब सरकार ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने की किसी शर्त का जिक्र किया था। हालांकि अगले ही दिन ट्रंप ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि यह समझौता Abraham Accords में सऊदी अरब की भागीदारी पर निर्भर करेगा। इस नए बयान के बाद माना जा रहा है कि समझौते को अंतिम मंजूरी मिलने की प्रक्रिया पहले से अधिक जटिल हो सकती है।
क्या है सऊदी अरब का रुख?
सऊदी अरब पहले भी कई बार साफ कर चुका है कि वह इजरायल के साथ सामान्य संबंध तभी स्थापित करेगा, जब फिलिस्तीनी राज्य के गठन की दिशा में ठोस और विश्वसनीय कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के विचार का विरोध करते रहे हैं। उनका कहना है कि यह इजरायल की सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। यही कारण है कि ट्रंप की नई शर्त को लागू करना आसान नहीं माना जा रहा है।
Abraham Accords क्या है?
Abraham Accords अमेरिका की मध्यस्थता में वर्ष 2020 में शुरू हुई राजनयिक समझौतों की एक श्रृंखला है। इसका उद्देश्य इजरायल और मुस्लिम बहुल देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को सामान्य बनाना है। 15 सितंबर 2020 को व्हाइट हाउस में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इजरायल और कई अरब देशों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए इजरायल-फिलिस्तीन विवाद के समाधान को पूर्व शर्त नहीं बनाया गया।
किन देशों ने किया है समझौता?
Abraham Accords में अब तक संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को, सूडान सहित कई देशों ने भाग लिया है। इस पहल को मध्य पूर्व में अमेरिका की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जाता है। यदि भविष्य में सऊदी अरब भी इस समझौते का हिस्सा बनता है, तो इसे क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक माना जाएगा।
ईरान को लेकर भी उठ रहे सवाल
सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित न्यूक्लियर समझौते के बाद एक नई बहस भी शुरू हो गई है। कई विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कड़ा रुख अपनाया था, तो अब सऊदी अरब के साथ सिविल न्यूक्लियर सहयोग को मंजूरी देने की दिशा में क्यों बढ़ रहा है।विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला मध्य पूर्व में बदलते रणनीतिक समीकरणों, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।
मध्य पूर्व की राजनीति पर पड़ सकता है असर
अगर ट्रंप की शर्त के अनुसार सऊदी अरब और इजरायल के बीच संबंध सामान्य करने की दिशा में कोई ठोस प्रगति होती है, तो इसका असर पूरे मध्य पूर्व की राजनीति पर पड़ सकता है। वहीं यदि फिलिस्तीन का मुद्दा अनसुलझा रहता है, तो इस समझौते के आगे बढ़ने में बड़ी बाधाएं भी आ सकती हैं। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर है कि सऊदी अरब इस नई शर्त पर क्या रुख अपनाता है और अमेरिका इस समझौते को आगे कैसे बढ़ाता है।
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