ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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बेहतर रोजगार और अधिक आय की उम्मीद में हर साल लाखों भारतीय खाड़ी देशों समेत दुनिया के कई देशों में काम करने जाते हैं। हालांकि, विदेश मंत्रालय (MEA) के आधिकारिक आंकड़े प्रवासी भारतीय कामगारों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाने वाले हैं। आंकड़ों के अनुसार, 2023 से 2025 के बीच कार्यस्थल पर हुए हादसों में 800 से अधिक भारतीय कामगारों की मौत हुई, जिनमें करीब 55 प्रतिशत मौतें खाड़ी देशों में दर्ज की गईं। इसके अलावा, 2021 से 2025 के बीच विदेशों में विभिन्न कारणों से कुल 37,740 भारतीय नागरिकों की मौत हुई है। इन आंकड़ों ने प्रवासी श्रमिकों की कार्य परिस्थितियों और सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कार्यस्थल हादसों में सबसे ज्यादा मौतें खाड़ी देशों में
विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2023 से 2025 के दौरान विदेशों में काम करते समय हुए हादसों में 800 से अधिक भारतीयों की जान गई। इनमें से लगभग 55 प्रतिशत मौतें खाड़ी देशों में हुईं। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में औसतन हर सप्ताह लगभग तीन भारतीय कामगारों की कार्यस्थल हादसों में मौत हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक गर्मी, जोखिम भरे कार्यस्थल और सुरक्षा मानकों का पर्याप्त पालन न होना इन हादसों के प्रमुख कारण हो सकते हैं।
सऊदी अरब और यूएई में सबसे अधिक मामले
आंकड़ों के अनुसार, सऊदी अरब में कार्यस्थल पर हादसों के कारण सबसे अधिक 182 भारतीय कामगारों की मौत दर्ज की गई। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में 128 भारतीयों की जान गई। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि कतर के रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी में हुए गैस विस्फोट में 12 भारतीय कामगारों की मौत हुई थी। यह घटना प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर सबसे गंभीर मामलों में गिनी जाती है।
पांच वर्षों में 37 हजार से अधिक भारतीयों की मौत
विदेश मंत्रालय के अनुसार, यदि बीमारी, प्राकृतिक मौत, सड़क दुर्घटना, कार्यस्थल हादसे और अन्य सभी कारणों को शामिल किया जाए तो 2021 से 2025 के बीच विदेशों में 37,740 भारतीयों की मौत हुई। रिपोर्ट के मुताबिक यह औसतन प्रतिदिन 20 से अधिक मौतों के बराबर है। इनमें 86 प्रतिशत से ज्यादा मौतें खाड़ी देशों में दर्ज की गईं, जहां बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रोजगार के लिए काम करते हैं।
किन चुनौतियों का सामना करते हैं प्रवासी मजदूर?
खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय श्रमिकों को कई तरह की कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इनमें शामिल हैं—
• अत्यधिक गर्मी में लंबे समय तक काम
• शारीरिक रूप से कठिन और जोखिम भरे कार्य
• सुरक्षा संबंधी प्रशिक्षण की कमी
• 12 घंटे या उससे अधिक समय तक काम
• वेतन में देरी या कटौती
• भीड़भाड़ और खराब रहने की व्यवस्था
• मानसिक तनाव और आत्महत्या के बढ़ते मामले
विदेश मंत्रालय ने यह भी संकेत दिया है कि कुछ मामलों में कार्यस्थल पर हुई दुर्घटनाओं को प्राकृतिक मौत या हार्ट अटैक बताने के आरोप सामने आए हैं, जिससे पीड़ित परिवारों के मुआवजे के दावों पर असर पड़ सकता है।
भारतीय कामगारों की मदद के लिए सरकार की पहल
विदेश मंत्रालय का कहना है कि प्रवासी भारतीयों की सहायता के लिए कई व्यवस्थाएं की गई हैं। दुबई, रियाद, जेद्दा और नई दिल्ली में प्रवासी भारतीय सहायता केंद्र (PBSK) काम कर रहे हैं, जहां जरूरतमंद भारतीयों को सहायता उपलब्ध कराई जाती है। इसके अलावा ई-माइग्रेट (e-Migrate) पोर्टल के माध्यम से विशेष रूप से महिला कामगारों की भर्ती केवल सरकार से अधिकृत एजेंसियों के जरिए सुनिश्चित की जाती है, ताकि धोखाधड़ी और शोषण के मामलों को रोका जा सके।
खाड़ी देशों में कामगारों को मिलने वाले अधिकार
खाड़ी देशों के श्रम कानूनों में प्रवासी कामगारों की सुरक्षा के लिए कई प्रावधान किए गए हैं।
• कतर में नियोक्ता द्वारा कर्मचारी का पासपोर्ट जब्त करना प्रतिबंधित है।
• सऊदी अरब के श्रम कानून के तहत एक वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद भुगतान सहित वार्षिक अवकाश और कुछ परिस्थितियों में मेडिकल लीव का अधिकार मिलता है।
• कई खाड़ी देशों में गर्मियों के दौरान दोपहर के सबसे गर्म समय में खुले में काम कराने पर प्रतिबंध लगाया जाता है, ताकि हीट स्ट्रोक और अन्य गर्मी से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम किया जा सके।
विदेश मंत्रालय के ताजा आंकड़े यह बताते हैं कि विदेशों, विशेषकर खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालांकि सरकार ने सहायता केंद्रों, ई-माइग्रेट पोर्टल और अन्य व्यवस्थाओं के जरिए सुरक्षा और सहायता बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन कार्यस्थलों पर बेहतर सुरक्षा, समय पर वेतन, उचित आवास और श्रमिक अधिकारों के प्रभावी पालन की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है। इससे लाखों भारतीय प्रवासी कामगारों के जीवन और उनके परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है
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