ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव का असर अब खाड़ी देशों पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव के बीच ईरान में अब उन अरब देशों के नेताओं को भी निशाने पर लेने की मांग उठ रही है, जिन्होंने अमेरिका को सैन्य ठिकानों और एयरस्पेस के इस्तेमाल की सुविधा दी है।ईरान के एक सांसद अमीरहोसैन साबेती ने मांग की है कि अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देशों के शासकों के नाम भी कथित 'हिट लिस्ट' में शामिल किए जाएं। हालांकि, यह मांग ईरानी सांसद की राजनीतिक टिप्पणी है और इसे ईरान सरकार की आधिकारिक नीति मानना सही नहीं होगा।
ट्रंप और नेतन्याहू पहले से निशाने पर
रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की धमकियों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू प्रमुख नामों में शामिल बताए जा रहे हैं। ईरान में अमेरिका और इजरायल के खिलाफ पहले भी कई कड़े बयान सामने आते रहे हैं। अब कुछ ईरानी नेताओं की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि अगर अमेरिका ने ईरान के खिलाफ कार्रवाई के लिए अरब देशों की जमीन या एयरस्पेस का इस्तेमाल किया है, तो इन देशों के शासकों को भी जवाबदेही के दायरे में लाया जाना चाहिए।
किन अरब राजवंशों का हो रहा है जिक्र?
इस बहस में तीन प्रमुख खाड़ी राजवंशों का नाम सामने आ रहा है। इनमें सऊदी अरब का अल सऊद परिवार, संयुक्त अरब अमीरात का अल नाहयान परिवार और बहरीन का अल खलीफा परिवार शामिल हैं। सऊदी अरब के किंग सलमान बिन अब्दुलअजीज अल सऊद हैं, जबकि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान देश के प्रधानमंत्री और सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं। UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान हैं। वहीं, शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम देश के प्रधानमंत्री और दुबई के शासक हैं। बहरीन के किंग हमद बिन ईसा अल खलीफा हैं और उनके बेटे सलमान बिन हमद अल खलीफा क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री हैं।
ईरान और खाड़ी देशों के बीच क्यों बढ़ सकता है तनाव?
ईरान लंबे समय से खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का विरोध करता रहा है। ईरान का आरोप है कि अमेरिका क्षेत्र के कुछ देशों में मौजूद सैन्य अड्डों का इस्तेमाल उसके खिलाफ कर सकता है। इसी वजह से ईरान की ओर से पड़ोसी देशों को यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि वे अमेरिकी सैन्य गतिविधियों से दूरी बनाए रखें। हालांकि, ईरान ने कई मौकों पर यह भी कहा है कि उसकी दुश्मनी पड़ोसी देशों से नहीं बल्कि अमेरिकी सैन्य मौजूदगी से है।अगर ईरान की धमकियां सीधे खाड़ी देशों के शासकों तक पहुंचती हैं, तो इससे पहले से संवेदनशील पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ सकता है।
कतर और ईरान के बीच भी विवाद
इसी बीच कतर और ईरान के बीच भी एक अलग विवाद सामने आया है। ईरान की ओर से दावा किया गया है कि उसके कुछ पायलट कतर की हिरासत में हैं। कतर ने इस आरोप को खारिज किया है और कहा है कि उसने किसी ईरानी पायलट को बंदी नहीं बनाया। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब कतर में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। ऐसे में ईरान और कतर के बीच आरोप-प्रत्यारोप क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकते हैं।
NATO जैसी सुरक्षा व्यवस्था की चर्चा
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच मुस्लिम देशों के बीच एक नए सुरक्षा ढांचे की चर्चा भी तेज हुई है। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग को लेकर समझौते की खबरें सामने आई हैं। इस तरह के समझौतों को कुछ लोग NATO जैसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की दिशा में कदम के तौर पर देख रहे हैं। हालांकि, इसे NATO का औपचारिक विकल्प कहना अभी जल्दबाजी होगी।
पश्चिम एशिया में बदल रहे समीकरण
ईरान-अमेरिका तनाव अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रह गया है। इसका सीधा असर सऊदी अरब, UAE, कतर और बहरीन जैसे खाड़ी देशों की सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।अगर ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य टकराव फिर बढ़ता है, तो सबसे बड़ी चुनौती इन देशों के सामने अपनी सुरक्षा और अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्तों के बीच संतुलन बनाने की होगी। फिलहाल ईरान की ओर से सामने आ रही धमकियों और राजनीतिक बयानों ने खाड़ी क्षेत्र में एक नया तनाव जरूर पैदा कर दिया है।
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