ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के बीच अब लड़ाई का एक और मोर्चा खुलता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन ईरान पर सैन्य दबाव के साथ-साथ आर्थिक दबाव भी बढ़ा रहा है। इसी रणनीति के तहत अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने ‘Economic D-Day’ अभियान का ऐलान किया है। अमेरिका का साफ मकसद ईरान की कमाई के रास्तों को बंद करना और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक रूप से अलग-थलग करना है।
क्या है अमेरिका का ‘Economic D-Day’?
स्कॉट बेसेंट के मुताबिक अमेरिका उन देशों और संस्थाओं पर सेकेंडरी प्रतिबंध बढ़ाएगा, जो ईरान के साथ कारोबार जारी रखते हैं। इसका मतलब यह है कि सिर्फ ईरानी कंपनियां ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों की वे कंपनियां और संस्थाएं भी अमेरिकी कार्रवाई की जद में आ सकती हैं, जो तेहरान के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखेंगी। बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ईरान की सरकार तक पहुंचने वाली आर्थिक ‘लाइफलाइन’ को खत्म करना चाहता है। इसके लिए तेल की बिक्री, फंड ट्रांसफर और प्रतिबंधों से बचने वाले नेटवर्क पर खास नजर रखी जा रही है।
करीब 60 संस्थाओं और जहाजों पर कार्रवाई
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने ईरान से जुड़े करीब 60 लोगों, संस्थाओं और जहाजों के खिलाफ नए प्रतिबंधों का ऐलान किया है। इनका संबंध ईरान के तेल, परमाणु, मिसाइल और साइबर नेटवर्क से बताया गया है। इसके अलावा डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग से जुड़े नेटवर्क भी अमेरिकी कार्रवाई के दायरे में आए हैं। अमेरिका का आरोप है कि कुछ कंपनियां ईरान को तेल बेचने और अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद कर रही हैं।
दूसरे देशों को भी अमेरिका की चेतावनी
बेसेंट ने दुनिया के दूसरे देशों को भी साफ संदेश दिया है। उनका कहना है कि सरकारों के पास ईरान से जुड़ी उन गतिविधियों को रोकने के लिए एक तय समय-सीमा है, जिन्हें अमेरिका प्रतिबंधों से बचने वाला नेटवर्क मानता है। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि देशों को कार्रवाई के लिए कितना समय दिया गया है। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि अमेरिकी निर्देश नहीं मानने पर कौन-कौन सी सजा दी जाएगी। अमेरिकी ट्रेजरी, विदेश विभाग और सेना की टीमें दूसरे देशों के अधिकारियों से संपर्क कर रही हैं।
ट्रंप खुद कर रहे विदेशी नेताओं से बात
स्कॉट बेसेंट के मुताबिक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी अलग-अलग देशों के नेताओं से सीधे बातचीत कर रहे हैं। अमेरिका चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा देश ईरान के साथ अपने आर्थिक संबंधों पर दोबारा विचार करें। बेसेंट ने चेतावनी दी कि जो देश अमेरिका के साथ खड़े होंगे, उन्हें अमेरिकी साझेदारी का फायदा मिलेगा। वहीं ईरान के साथ जुड़े रहने वाले देशों और संस्थाओं को अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका ने यह भी संकेत दिया है कि ईरान से जुड़ी वित्तीय संस्थाओं के खिलाफ आने वाले दिनों में और कार्रवाई की जा सकती है।
चीन पर भी अमेरिका की नजर
इस पूरे अभियान में चीन सबसे महत्वपूर्ण देशों में से एक है। चीन लंबे समय से ईरानी तेल का बड़ा खरीदार रहा है। ऐसे में अमेरिका की कोशिश ईरान के तेल कारोबार से जुड़े चीनी नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने की भी है। हालांकि अभी तक अमेरिका ने इस व्यापार से जुड़े बड़े चीनी बैंकों पर व्यापक कार्रवाई नहीं की है। यही वजह है कि आगे की अमेरिकी रणनीति पर दुनिया की नजर बनी हुई है।
ईरान ने अमेरिका को दी चुनौती
ईरान ने अमेरिका के बढ़ते आर्थिक दबाव को खारिज किया है। ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेरी गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका दूसरे देशों को ईरान के साथ संबंध खत्म करने के लिए मजबूर करने की स्थिति में नहीं है। उनका कहना है कि ईरान के व्यापारिक साझेदार अमेरिकी धमकियों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। यानी एक तरफ अमेरिका ईरान की आर्थिक ‘लाइफलाइन’ काटने की कोशिश कर रहा है, वहीं तेहरान का दावा है कि उसके पास अमेरिकी प्रतिबंधों से निपटने के रास्ते मौजूद हैं।
ईरान के लिए आगे की चुनौती
ईरान पहले भी अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए नई कंपनियां, वैकल्पिक वित्तीय चैनल और अलग-अलग नामों से पंजीकृत जहाजों का इस्तेमाल करता रहा है। अब अमेरिका इन्हीं नेटवर्क को निशाना बनाने की कोशिश कर रहा है। अगर वॉशिंगटन अपने सेकेंडरी प्रतिबंधों को बड़े स्तर पर लागू करने में सफल रहता है, तो ईरान के तेल कारोबार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन ईरान और उसके व्यापारिक साझेदार अमेरिकी दबाव के सामने कितना झुकते हैं, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। फिलहाल अमेरिका-ईरान संघर्ष का आर्थिक मोर्चा और ज्यादा तेज होता दिखाई दे रहा है।
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