ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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अमेरिका और चीन के रिश्तों की चर्चा होते ही एक सवाल अक्सर पूछा जाता है—अमेरिका पर चीन का कितना कर्ज है?
आम भाषा में कहा जाता है कि अमेरिका चीन का कर्जदार है। लेकिन असल में मामला अमेरिकी सरकार द्वारा जारी Treasury securities यानी सरकारी बॉन्ड से जुड़ा है। चीन लंबे समय तक इन अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों का बड़ा विदेशी धारक रहा है।
Treasury Bonds क्या होते हैं?
अमेरिकी सरकार अपने खर्च और वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए Treasury bills, notes और bonds जारी करती है।
दुनिया भर के निवेशक इन्हें खरीदते हैं। इसके बदले अमेरिकी सरकार तय शर्तों के अनुसार ब्याज और मूलधन चुकाती है।
यानी अगर चीन के पास अमेरिकी Treasury securities हैं तो अमेरिका उन प्रतिभूतियों से जुड़ी वित्तीय जिम्मेदारी रखता है।
चीन इन्हें क्यों खरीदता है?
चीन के पास लंबे समय से बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार रहा है। किसी भी देश को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित और आसानी से इस्तेमाल होने वाली संपत्तियों में रखना होता है।
अमेरिकी Treasury market दुनिया के सबसे बड़े और सक्रिय सरकारी बॉन्ड बाजारों में शामिल है। इसलिए चीन जैसे देश इन प्रतिभूतियों में निवेश करते रहे हैं।
क्या चीन अमेरिका का सबसे बड़ा कर्जदाता है?
यह तस्वीर समय के साथ बदलती रहती है। चीन अमेरिकी Treasury securities का बड़ा धारक रहा है, लेकिन अमेरिकी सरकारी कर्ज का पूरा हिस्सा केवल चीन के पास नहीं है।
अमेरिकी सरकारी बॉन्ड दुनिया के कई देशों, वित्तीय संस्थानों और खुद अमेरिकी निवेशकों के पास होते हैं।
इसलिए पूरे अमेरिकी कर्ज को सिर्फ चीन के खाते से जोड़ना सही नहीं होगा।
चीन की हिस्सेदारी में बदलाव
समय के साथ चीन ने अमेरिकी Treasury securities में अपनी हिस्सेदारी घटाई-बढ़ाई है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।
विदेशी मुद्रा भंडार की रणनीति, डॉलर की स्थिति, वैश्विक ब्याज दरें और चीन की अपनी आर्थिक नीति ऐसे फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए किसी एक महीने के आंकड़े से चीन की पूरी आर्थिक रणनीति तय नहीं की जा सकती।
अमेरिका-चीन रिश्ते पर असर
अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को लेकर कई मतभेद हैं। लेकिन दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं।
अमेरिकी Treasury securities में चीन का निवेश इसी आर्थिक रिश्ते का एक हिस्सा है।
अगर कोई बड़ा विदेशी निवेशक अमेरिकी बॉन्ड की खरीद-बिक्री में बड़ा बदलाव करता है तो वित्तीय बाजारों पर चर्चा शुरू हो सकती है, लेकिन वास्तविक असर कई दूसरे आर्थिक कारकों पर निर्भर करता है।
भारत पर भी असर पड़ सकता है
अमेरिका और चीन दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। उनके बीच आर्थिक तनाव या सहयोग का असर बाकी देशों पर भी पड़ सकता है।
डॉलर की कीमत, वैश्विक ब्याज दरें, निवेश और अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे क्षेत्रों में बदलाव भारत तक भी पहुंच सकते हैं।
इसी वजह से चीन के पास अमेरिकी सरकारी बॉन्ड कितने हैं, यह सिर्फ अमेरिका और चीन का सवाल नहीं है। इसका संबंध पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था से है।
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