ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
महंगाई का असर सिर्फ आम आदमी की रसोई तक सीमित नहीं रहता, कई बार इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर भी दिखाई देता है। भारत में प्याज इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। प्याज की कीमत बढ़ते ही जनता की नाराजगी सरकार के खिलाफ दिखाई देने लगी और कई चुनावों में विपक्ष ने इसे बड़ा राजनीतिक हथियार बनाया। 1998 का दौर तो इतना चर्चित हुआ कि प्याज की महंगाई पर भोजपुरी गीत तक लिखे गए—“अब का सलाद खईबस पियजिया अनार हो गईल...” उस समय प्याज के दाम 50 से 60 रुपये किलो तक पहुंच गए थे। भाजपा को दिल्ली और राजस्थान में इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन प्याज और राजनीति का यह रिश्ता 1998 से काफी पुराना है।
1977 के बाद प्याज बना इंदिरा गांधी का हथियार
1975 में देश में आपातकाल लागू हुआ था। इसके दो साल बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी ने 295 सीटें जीतकर सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस 154 सीटों पर सिमट गई। लेकिन जनता पार्टी सरकार लंबे समय तक राजनीतिक स्थिरता कायम नहीं रख सकी। इसी दौरान महंगाई और आर्थिक परेशानियों ने जनता की मुश्किलें बढ़ाईं। प्याज के दाम जब करीब 5 रुपये किलो तक पहुंचे तो यह आम लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन गया।
उस समय की कीमतों के हिसाब से यह बहुत बड़ी बढ़ोतरी थी। इंदिरा गांधी ने जनता की नाराजगी को समझ लिया और प्याज को चुनावी मुद्दा बना दिया। वह चुनावी रैलियों में प्याज की माला पहनकर पहुंचीं और सरकार पर निशाना साधा। 1980 के चुनाव में कांग्रेस ने सस्ती प्याज का वादा किया और 353 सीटों के साथ सत्ता में जबरदस्त वापसी की। यही वह दौर था जब प्याज को लेकर यह धारणा मजबूत हुई कि रसोई की कीमतें सीधे सत्ता का रास्ता बदल सकती हैं।
1998 में प्याज ने भाजपा को दिया बड़ा झटका
करीब दो दशक बाद 1998 में प्याज ने फिर राजनीति को गर्म कर दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले प्याज की कीमत 50 से 60 रुपये किलो तक पहुंच गई। महंगाई से नाराज लोगों के बीच प्याज सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। भाजपा ने चुनाव से कुछ ही समय पहले दिल्ली की राजनीति में बदलाव करते हुए साहिब सिंह वर्मा की जगह सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन तब तक विपक्ष को बड़ा मुद्दा मिल चुका था।
कांग्रेस ने प्याज की महंगाई को जमकर उठाया और चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं। राजस्थान में भी इसी साल प्याज की कीमतों का असर देखने को मिला। भाजपा के मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत को सत्ता गंवानी पड़ी। चुनाव के बाद उन्होंने भी माना कि प्याज की कीमतों ने चुनावी समीकरण बिगाड़ दिया था।
महाराष्ट्र में मिठाई के डिब्बे में भेजा प्याज
1998 में प्याज को लेकर महाराष्ट्र में भी राजनीति अपने चरम पर थी। दिवाली के आसपास राज्य में प्याज की भारी कमी हो गई थी। इसी दौरान कांग्रेस नेता छगन भुजबल ने विरोध का अनोखा तरीका अपनाया। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को मिठाई के डिब्बे में मिठाई की जगह प्याज भेज दिया। यह मामला काफी चर्चा में रहा। सरकार पर दबाव बढ़ा और बाद में राशन कार्ड धारकों को रियायती कीमत पर प्याज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई। यह घटना बताती है कि प्याज उस समय तक सिर्फ घरेलू जरूरत की चीज नहीं रह गया था, बल्कि सरकार के खिलाफ राजनीतिक प्रतीक भी बन चुका था।
2010 में बारिश ने बढ़ाई प्याज की कीमत
साल 2010 में महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख प्याज उत्पादक राज्यों में भारी बारिश से फसल को बड़ा नुकसान हुआ। इसका असर देश के बाजारों पर पड़ा। दिसंबर में दिल्ली में प्याज की कीमत करीब एक सप्ताह के भीतर 35 रुपये से बढ़कर लगभग 80 रुपये किलो तक पहुंच गई। कीमत बढ़ते ही देश के कई हिस्सों में विरोध शुरू हो गया। केंद्र सरकार को भी तुरंत कदम उठाने पड़े। प्याज के निर्यात पर रोक लगाई गई, आयात शुल्क कम किया गया और दूसरे देशों से प्याज मंगाने की कोशिश की गई। इन कदमों के बाद कीमतों में कुछ राहत आई।
2013 में फिर लौटा प्याज का मुद्दा
प्याज की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर इसकी कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई। उस समय दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार लगातार 15 साल से सत्ता में थी। विपक्ष ने महंगाई और प्याज की बढ़ती कीमतों को सरकार की नाकामी से जोड़ दिया। शीला दीक्षित ने भी बढ़ती कीमतों पर अपनी परेशानी जाहिर करते हुए कहा था कि महंगाई की वजह से उन्होंने प्याज खाना कम कर दिया है। लेकिन जनता की नाराजगी कम नहीं हुई। दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा और 15 साल पुरानी शीला दीक्षित सरकार सत्ता से बाहर हो गई।
प्याज क्यों बन जाता है इतना बड़ा चुनावी मुद्दा?
भारत में प्याज लगभग हर घर की रसोई का हिस्सा है। इसलिए इसकी कीमत में अचानक बढ़ोतरी का असर सीधे आम परिवार के बजट पर पड़ता है। यही वजह है कि जब प्याज 50, 60 या 80 रुपये किलो तक पहुंचता है, तो महंगाई का असर सिर्फ आंकड़ों में नहीं दिखता, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में महसूस होता है। 1977 के बाद से 1998 और फिर 2013 तक प्याज कई बार चुनावी राजनीति के केंद्र में रहा है। कभी इसने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दिया, तो कभी सत्ता में बैठे दलों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं। इसलिए भारत की राजनीति में प्याज सिर्फ एक सब्जी नहीं, बल्कि रसोई से सत्ता तक पहुंचने वाला बेहद संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।
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