ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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सिक्किम के नामची जिले में सुरंग निर्माण के दौरान हुए हादसे ने पूरे देश का ध्यान पहाड़ों के भीतर मौजूद मीथेन गैस के खतरे की ओर खींचा है। सुरंग के अंदर अचानक गैस निकलने और विस्फोट जैसी घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर चट्टानों के भीतर मीथेन गैस बनती कैसे है और यह इतनी खतरनाक क्यों मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में सुरंग निर्माण के दौरान इस तरह के जोखिम को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए निर्माण कार्य से पहले विस्तृत भू-वैज्ञानिक जांच और सुरक्षा उपाय बेहद जरूरी होते हैं।
कैसे बनती है चट्टानों में मीथेन गैस?
अक्सर माना जाता है कि मीथेन गैस केवल कचरे या जैविक पदार्थों के सड़ने से बनती है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह गैस कुछ विशेष भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं से भी बन सकती है। पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाने वाली पेरिडोटाइट (Peridotite) और सर्पेंटीनाइट (Serpentinite) जैसी चट्टानों में लोहे और मैग्नीशियम की मात्रा अधिक होती है। जब इन खनिजों का लंबे समय तक पानी के साथ संपर्क होता है, तो एक रासायनिक प्रक्रिया शुरू होती है, जिससे पहले हाइड्रोजन गैस बनती है। इसके बाद यही हाइड्रोजन चट्टानों में मौजूद कार्बन के साथ प्रतिक्रिया कर मीथेन गैस का निर्माण कर सकती है। यह गैस वर्षों तक चट्टानों की महीन दरारों और छिद्रों में फंसी रह सकती है।
सुरंग निर्माण के दौरान क्यों बढ़ जाता है खतरा?
जब पहाड़ों में सुरंग खोदी जाती है या चट्टानों को विस्फोट कर तोड़ा जाता है, तो अंदर फंसी हुई गैस अचानक बाहर निकल सकती है। यदि यह गैस बंद जगह में जमा हो जाए और वहां कोई चिंगारी या गर्म सतह मौजूद हो, तो विस्फोट का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि सुरंग निर्माण परियोजनाओं में गैस की निगरानी के लिए विशेष उपकरणों का उपयोग किया जाता है।
मीथेन गैस क्यों है जानलेवा?
मीथेन गैस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह रंगहीन और गंधहीन होती है। यानी इंसान इसे न आंखों से देख सकता है और न ही इसकी गंध महसूस कर सकता है। यदि किसी बंद सुरंग में इसकी मात्रा बढ़ जाए, तो यह ऑक्सीजन का स्तर कम कर सकती है। ऐसी स्थिति में लोगों को सांस लेने में कठिनाई हो सकती है और दम घुटने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा मीथेन अत्यधिक ज्वलनशील गैस है। हवा में एक निश्चित अनुपात में मौजूद होने पर यह छोटी-सी चिंगारी से भी विस्फोट का कारण बन सकती है।
सुरक्षा के लिए क्या किए जाते हैं उपाय?
विशेषज्ञों के अनुसार सुरंग निर्माण से पहले भू-वैज्ञानिक सर्वे, गैस परीक्षण और चट्टानों की संरचना का अध्ययन किया जाता है। निर्माण के दौरान गैस डिटेक्टर, वेंटिलेशन सिस्टम और आपातकालीन सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है ताकि किसी भी संभावित खतरे का समय रहते पता लगाया जा सके। इसके अलावा, सुरंगों में लगातार हवा का प्रवाह बनाए रखना भी बेहद जरूरी होता है ताकि किसी भी गैस का जमाव न हो।
सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव
पहाड़ी इलाकों में बनने वाली सुरंगें विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके निर्माण में प्राकृतिक जोखिम भी जुड़े होते हैं। ऐसे में वैज्ञानिक जांच, आधुनिक तकनीक और कड़े सुरक्षा मानकों का पालन करना किसी भी बड़े हादसे से बचने के लिए सबसे जरूरी माना जाता है।
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