ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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दवाओं की बढ़ती कीमतों और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। 29 सितंबर 2026 को सुनवाई के दौरान अदालत के सामने कैंसर की एक दवा का उदाहरण रखा गया, जिसमें खुदरा विक्रेता को दवा करीब 2,700 रुपये में मिलने और मरीज से लगभग 27,000 रुपये वसूले जाने की बात सामने आई।
कोर्ट ने किस बात पर सवाल उठाया?
सुप्रीम कोर्ट ने दवा की कीमत और मरीज से ली जा रही रकम के बीच इतने बड़े अंतर पर सवाल किया। अदालत ने पूछा कि अगर Drugs Prices Control Order यानी DPCO, 2013 में 16 प्रतिशत रिटेल मार्जिन का प्रावधान है तो इसे हर दवा पर लागू क्यों नहीं किया जाता। यही सवाल इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। दवा की कीमत सिर्फ कंपनी की लागत से तय नहीं होती। इसमें निर्माता, डिस्ट्रीब्यूटर, स्टॉकिस्ट, रिटेलर और टैक्स जैसी कई चीजें शामिल हो सकती हैं।
16 प्रतिशत रिटेल मार्जिन क्या है?
दवा के कारोबार में रिटेल मार्जिन का मतलब उस हिस्से से है जो खुदरा विक्रेता को बिक्री से मिलता है। सरकार कुछ आवश्यक दवाओं की कीमत और मार्जिन को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाती है। लेकिन सभी दवाओं पर एक जैसी व्यवस्था लागू होती है या नहीं, यह दवा की श्रेणी और संबंधित नियमों पर निर्भर करता है। इसी बात को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है।
मरीजों के लिए इसका क्या मतलब?
दवाओं की कीमत बढ़ने का सीधा असर मरीज की जेब पर पड़ता है। खासकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में लंबे समय तक इलाज और महंगी दवाओं की जरूरत पड़ सकती है। अगर किसी दवा की खरीद कीमत और मरीज से ली जाने वाली कीमत में बड़ा अंतर है तो परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। इसी वजह से दवाओं की कीमत में पारदर्शिता और उचित मार्जिन का मुद्दा काफी महत्वपूर्ण है।
सरकार से मांगा गया जवाब
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होनी है। इसका मतलब है कि अभी कोर्ट ने अंतिम फैसला नहीं दिया है। सरकार को दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था और 16 प्रतिशत मार्जिन से जुड़े सवालों पर अपना पक्ष रखना है।
दवा की कीमत कैसे तय होती है?
किसी दवा की अंतिम कीमत तक पहुंचने में कई स्तर शामिल होते हैं। सबसे पहले दवा का निर्माण होता है। उसके बाद सप्लाई चेन के अलग-अलग चरण आते हैं। निर्माता से डिस्ट्रीब्यूटर, फिर स्टॉकिस्ट और रिटेलर तक दवा पहुंचती है। कुछ दवाओं पर सरकार की ओर से कीमत की सीमा तय होती है, जबकि कई दवाएं अलग नियमों के तहत आती हैं। यही वजह है कि हर दवा की कीमत को एक ही तरीके से समझना सही नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है?
अदालत की टिप्पणी ने दवाओं की कीमत और मरीजों से वसूली के बीच अंतर को फिर चर्चा में ला दिया है। खासकर कैंसर की दवा के उदाहरण ने यह सवाल सामने रखा कि गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमत मरीजों के लिए कितनी सुलभ होनी चाहिए। अब अगली सुनवाई में केंद्र सरकार का जवाब महत्वपूर्ण होगा। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि 16 प्रतिशत रिटेल मार्जिन का नियम किन दवाओं पर लागू होता है और सरकार कीमतों में बड़े अंतर को लेकर क्या व्यवस्था रखती है। फिलहाल मामला अदालत में विचाराधीन है और 12 अक्टूबर की सुनवाई के बाद तस्वीर कुछ और साफ हो सकती है।
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