ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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मुंबई में हुए 26/11 आतंकी हमलों के मामले में भारत ने अब एक महत्वपूर्ण कानूनी कदम उठाया है। मुंबई पुलिस और गृह मंत्रालय ने पाकिस्तान में मौजूद छह आरोपियों के खिलाफ उनकी गैर-मौजूदगी में मुकदमा चलाने की प्रक्रिया शुरू की है। खास बात यह है कि यह कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 356 के तहत की जा रही है। BNSS ने 1 जुलाई 2024 से पुराने दंड प्रक्रिया संहिता यानी CrPC की जगह ली है। इस कानून में पहली बार गंभीर मामलों में ऐसे आरोपियों के खिलाफ उनकी गैर-मौजूदगी में ट्रायल पूरा करने का रास्ता स्पष्ट किया गया है, जो जानबूझकर भारतीय न्यायिक प्रक्रिया से बच रहे हों।
छह आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई
इस मामले में जिन छह पाकिस्तानी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, उनमें 26/11 हमलों की साजिश से जुड़े प्रमुख नाम शामिल हैं। इनमें लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज मोहम्मद सईद, ऑपरेशनल कमांडर जकी-उर-रहमान लखवी और मुख्य हैंडलर साजिद मीर शामिल हैं। इसके अलावा अबू अलकामा, आसिम उर्फ अबू कहफा और पाकिस्तान सेना के पूर्व अधिकारी मेजर अब्दुर रहमान पाशा भी आरोपी हैं। मुंबई पुलिस आयुक्त देवेन भारती की ओर से विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम को इस संबंध में जानकारी दी गई। इसके बाद अभियोजन पक्ष ने अदालत से BNSS की धारा 356 के तहत कार्रवाई की मांग की।
अदालत ने आरोपियों को दिया मौका
विशेष न्यायाधीश एस.आर. नवान्दर ने छहों आरोपियों के खिलाफ कानूनी नोटिस जारी किए और उन्हें 18 अगस्त तक अदालत में पेश होने का निर्देश दिया। निर्धारित समय तक आरोपियों के पेश नहीं होने के बाद अब अदालत उनके खिलाफ गैर-मौजूदगी में मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है। इसमें गवाहों के बयान दर्ज करना, सबूतों की जांच और मामले की सुनवाई पूरी करना शामिल हो सकता है। कानून में निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद अदालत अंतिम फैसला भी सुना सकती है।
पहले क्या था नियम?
पुराने कानून के तहत किसी आरोपी की गैर-मौजूदगी में मुकदमा पूरा करके उसे दोषी या बरी घोषित करना सामान्य तौर पर संभव नहीं था। अगर कोई आरोपी फरार हो जाता था, तो अदालत कुछ परिस्थितियों में गवाहों के बयान पहले से रिकॉर्ड कर सकती थी। लेकिन अंतिम फैसला आरोपी की अदालत में मौजूदगी के बाद ही संभव होता था। सीमा पार छिपे आरोपियों के मामलों में यही व्यवस्था बड़ी चुनौती बन जाती थी। आरोपी वर्षों तक भारत नहीं लौटते थे और मुकदमे अंतिम नतीजे तक नहीं पहुंच पाते थे।
BNSS की धारा 356 में क्या बदला?
BNSS की धारा 356 गंभीर अपराधों में एक नई कानूनी व्यवस्था देती है। हालांकि, इसका इस्तेमाल सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए कई शर्तें पूरी करना जरूरी है। पहली शर्त यह है कि अपराध गंभीर प्रकृति का होना चाहिए, जिसमें 10 साल या उससे अधिक की सजा, उम्रकैद या मौत की सजा का प्रावधान हो। इसके बाद आरोपी को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत Proclaimed Offender घोषित किया जाना जरूरी है। अदालत को लगातार दो गैर-जमानती वारंट जारी करने होते हैं और इनके बीच कम से कम 30 दिन का अंतर होना चाहिए।
आरोपी को सार्वजनिक सूचना के जरिए अदालत में पेश होने का अवसर भी दिया जाता है। विदेश में मौजूद आरोपी के मामले में अंतरराष्ट्रीय पुलिसिंग चैनलों के जरिए भी सूचना भेजी जा सकती है। आरोप तय होने के बाद कानून में 90 दिनों की प्रतीक्षा अवधि भी महत्वपूर्ण है। इस दौरान आरोपी के पास भारत लौटकर कानूनी प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर रहता है।
आरोपी की गैर-मौजूदगी में भी वकील होगा
इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आरोपी का कानूनी अधिकार है। अगर आरोपी खुद वकील नियुक्त नहीं करता या ऐसा करने में सक्षम नहीं है, तो अदालत उसकी ओर से राज्य के खर्च पर वकील नियुक्त कर सकती है। यह वकील अभियोजन के गवाहों से जिरह कर सकता है, सबूतों की जांच कर सकता है और आरोपी की ओर से अंतिम दलील रख सकता है। यानी ट्रायल आरोपी की गैर-मौजूदगी में होगा, लेकिन उसकी ओर से कानूनी बचाव की व्यवस्था बनी रहेगी।
हाफिज सईद पर भारत का आरोप
हाफिज मोहम्मद सईद को भारत 26/11 मुंबई आतंकी हमले की साजिश के प्रमुख आरोपियों में गिनता है। मुंबई हमलों में 166 लोगों की मौत हुई थी। हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने वैश्विक आतंकवादी घोषित किया है। अमेरिका ने भी उसे आतंकवादी घोषित किया है और उसकी गिरफ्तारी तथा दोषसिद्धि में मददगार सूचना के लिए इनाम की घोषणा की थी।
अब BNSS की धारा 356 के जरिए भारत ने पहली बार ऐसे बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी मामले में एक नया कानूनी रास्ता अपनाया है। इसका महत्व सिर्फ 26/11 मामले तक सीमित नहीं है। यह आगे उन मामलों के लिए भी मिसाल बन सकता है, जिनमें गंभीर अपराधों के आरोपी भारत से बाहर रहकर लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया से बचते रहे हैं।
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