ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
बिहार में एक बार फिर से सियासी बिसात बिछ चुकी है। 2025 विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं और सवाल बड़ा है - क्या नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बन पाएंगे?
करीब दो दशकों से सत्ता पर काबिज नीतीश को लेकर जनता की राय अब दो ध्रुवों में बंटी हुई है - प्रो-इनकंबेंसी या एंटी-इनकंबेंसी!
आइए 10 फैक्टर से समझते हैं कि आने वाले चुनाव में नीतीश कुमार फिर से CM की कुर्सी पर दिखेंगे या बाहर?
विकास और 'सुशासन बाबू' की छवि
2005 में लालू-राबड़ी के शासन को पीछे छोड़ते हुए नीतीश ने बिहार में कानून-व्यवस्था, सड़क और बिजली जैसे बुनियादी ढांचे को मजबूत किया।
यही कारण था कि उन्हें ‘सुशासन बाबू’ की पहचान मिली। 209,000+ किमी सड़कों का नेटवर्क, 20 घंटे बिजली, ये उपलब्धियां आज भी उनके पक्ष में मजबूत तर्क हैं।
महिलाओं का समर्थन
शराबबंदी, महिलाओं को पंचायत में 50% आरक्षण और स्कूल की लड़कियों को साइकिल योजना ने महिलाओं के बीच नीतीश की छवि मजबूत की।
महिलाओं का ये आधार वोट बैंक अब भी नीतीश की सबसे बड़ी ताकत है, जो प्रो-इनकंबेंसी को जिंदा रखता है।
सामाजिक इंजीनियरिंग
कोयरी-कुरमी और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) आज भी जेडीयू के साथ है। नीतीश की सामाजिक इंजीनियरिंग ने NDA को इन वर्गों में मज़बूती दी है।
लेकिन MY-BAAP यानी मुस्लिम-यादव-बहुजन-आधी आबादी-पिछड़े वर्ग की RJD रणनीति इस संतुलन को तोड़ने में लगी है।
'पलटू राम' टैग बना मुसीबत
नीतीश ने बीते 10 साल में पाँच बार राजनीतिक पाला बदला। बीजेपी से लेकर महागठबंधन और फिर वापस NDA में आना, उनकी विश्वसनीयता को लेकर जनता में संदेह पैदा करता है।
ये ‘यू-टर्न बाबू’ की छवि आज एंटी-इनकंबेंसी का अहम हथियार बन गई है।
बेरोजगारी और पलायन - सबसे बड़ा जन असंतोष
बिहार की प्रति व्यक्ति आय आज भी देश में सबसे कम है। बेरोजगारी दर करीब 45% और राज्य से भारी मात्रा में पलायन नीतीश सरकार के लिए गहरी चोट है।
युवा वर्ग में असंतोष चरम पर है, जो RJD और जन सुराज जैसी पार्टियों को ताकत देता है।
स्वास्थ्य और उम्र की वजह से नेतृत्व पर सवाल
74 साल के हो चुके नीतीश अब पहले जैसे एक्टिव नहीं दिखते। बिजनेस कनेक्ट 2024 जैसे महत्वपूर्ण आयोजनों से गायब रहना उनकी स्वास्थ्य स्थिति को लेकर सवाल उठाता है। एक बड़ा वर्ग अब उन्हें ‘थके हुए नेता’ के तौर पर देखने लगा है।
मुस्लिम वोट बैंक खिसका
वक्फ संशोधन बिल को समर्थन देने के बाद जेडीयू के पांच मुस्लिम नेता पार्टी छोड़ चुके हैं।
मुस्लिम वोटरों में नाराजगी है। पहले जो वोटर नीतीश को ‘सेक्युलर’ मानते थे, अब उनका रुख बदल चुका है।
प्रशांत किशोर - नई राजनीति का सिरदर्द
पूर्व रणनीतिकार प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज’ यात्रा और नीतीश को ‘मानसिक रूप से रिटायर्ड’ कह देना, सीधा उनकी राजनीतिक धार को चैलेंज करता है।
किशोर का प्रभाव खासकर युवा और मुस्लिम वर्ग पर तेजी से बढ़ रहा है।
RJD और तेजस्वी की चुनौती
तेजस्वी यादव का ग्राउंड कनेक्शन, युवाओं में लोकप्रियता और RJD का जातीय समीकरण MY-BAAP, नीतीश की नींव को झकझोर रहा है।
लोकसभा 2024 में औरंगाबाद जैसी सीट पर RJD की जीत इस बदलते रुख का संकेत है।
NDA का मोदी फैक्टर
‘2025 में नीतीश ही’ का नारा और बीजेपी का समर्थन उन्हें अब भी मजबूती देता है।
मोदी फैक्टर और NDA की संयुक्त ताकत नीतीश के पक्ष में प्रो-इनकंबेंसी का नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
जनता की राय क्या कहती है?
C-Voter सर्वे की मानें तो सिर्फ 18% लोग नीतीश को सीएम के तौर पर दोबारा देखना चाहते हैं, जबकि तेजस्वी यादव को 41% लोग प्राथमिकता देते हैं। ये अंतर बहुत कुछ बयां करता है।
कुर्सी हिल रही है, लेकिन पूरी गिरी नहीं
नीतीश कुमार के सामने चुनौती बड़ी है। महिला समर्थन, NDA की ताकत और सामाजिक इंजीनियरिंग उन्हें बचा सकती है। मगर बेरोजगारी, उम्र, गठबंधन अस्थिरता और विरोधी नैरेटिव उन्हें डुबो भी सकते हैं।
2025 में फैसला सिर्फ वोटर करेंगे - ‘सुशासन बाबू’ फिर से दिखेंगे या नया चेहरा आएगा।
आप क्या सोचते हैं इस खबर को लेकर, अपनी राय हमें नीचे कमेंट्स में जरूर बताएँ।
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