ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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दिल्ली के ट्रैफिक नेटवर्क में बारापूला फेज-3 एलिवेटेड कॉरिडोर एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के तौर पर सामने आया है। करीब नौ साल की देरी के बाद यह परियोजना अब तैयार हो गई है। इस कॉरिडोर के शुरू होने से पूर्वी दिल्ली, नोएडा और दक्षिणी दिल्ली के बीच आने-जाने वाले लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है।
नोएडा से AIIMS तक सफर आसान
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मयूर विहार से AIIMS तक पहुंचने में ट्रैफिक के कारण पहले करीब एक घंटे तक का समय लग सकता था। नए कॉरिडोर के शुरू होने के बाद यह समय करीब 15 से 20 मिनट तक आने का अनुमान बताया गया है। यह समय ट्रैफिक, प्रवेश और निकास की स्थिति के आधार पर बदल सकता है। लेकिन कॉरिडोर का उद्देश्य लंबी दूरी को कम समय में और कम सिग्नल के साथ पूरा करना है।
सिग्नल-फ्री कनेक्टिविटी
बारापूला फेज-3 के शुरू होने से मयूर विहार फेज-1 से AIIMS तक कनेक्टिविटी को सिग्नल-फ्री बनाने की योजना है। इससे पूर्वी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली के बीच रोजाना आने-जाने वाले लोगों को फायदा मिल सकता है। नोएडा और गाजियाबाद से दक्षिण दिल्ली की तरफ जाने वाले लोगों के लिए भी यह मार्ग उपयोगी हो सकता है।
प्रोजेक्ट में हुई लंबी देरी
इस परियोजना को 2014 में मंजूरी मिली थी और निर्माण 2015 में शुरू हुआ था। इसे पहले 2017 तक पूरा किया जाना था, लेकिन कई कारणों से काम समय पर पूरा नहीं हो पाया। भौगोलिक चुनौतियों, धीमी निर्माण गति और प्रशासनिक अड़चनों के कारण परियोजना में करीब नौ साल की देरी हुई। लंबी देरी के साथ इसकी लागत भी बढ़ी। अब संशोधित लागत करीब 1,635 करोड़ रुपये बताई गई है।
करीब 3.5 किलोमीटर का नया कॉरिडोर
बारापूला फेज-3 की लंबाई करीब 3.5 किलोमीटर बताई गई है। यह सराय काले खां के पास मौजूदा बारापूला फ्लाईओवर से जुड़ता है। इसके जुड़ने के बाद करीब 9 किलोमीटर का सीधा और सिग्नल-फ्री रास्ता तैयार होने की बात कही गई है। कॉरिडोर में साइकिल चलाने वालों के लिए अलग लेन और वॉकिंग के लिए भी जगह की व्यवस्था बताई गई है।
ट्रैफिक पर कितना असर पड़ेगा?
किसी भी नए कॉरिडोर के खुलने के बाद उसका वास्तविक असर कुछ समय में साफ होता है। वाहन किस मार्ग पर कितने बढ़ते हैं और ट्रैफिक किस तरह distribute होता है, इससे परिणाम बदल सकते हैं। फिलहाल उम्मीद यही है कि बारापूला फेज-3 पूर्वी और दक्षिणी दिल्ली के बीच यात्रा को आसान बनाएगा। नोएडा और गाजियाबाद से आने वाले लोगों के लिए भी यह कनेक्टिविटी उपयोगी हो सकती है। नौ साल की देरी के बाद तैयार हुए इस प्रोजेक्ट की असली परीक्षा अब इसके नियमित इस्तेमाल और ट्रैफिक पर पड़ने वाले प्रभाव से होगी।
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