ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
देश की चुनावी व्यवस्था से जुड़ा Special Intensive Revision यानी SIR एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में चर्चा का विषय है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ और SIR की प्रक्रिया को लेकर दाखिल याचिकाओं पर 5 अक्टूबर को सुनवाई होनी है। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने होने वाली है। याचिकाओं में चुनाव आयोग की ओर से अपनाई जा रही प्रक्रिया पर कई सवाल उठाए गए हैं।
वोटर लिस्ट में बदलाव को लेकर चिंता
याचिकाओं में मुख्य मुद्दा मतदाता सूची का है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि SIR के दौरान नाम जोड़ने, हटाने और वोटर डेटा में बदलाव की प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त स्पष्टता और सुरक्षा जरूरी है। सवाल यह भी है कि अगर किसी योग्य मतदाता का नाम सूची से हट जाता है तो उसके पास अपनी नागरिकता और मतदान का अधिकार साबित करने के लिए क्या प्रक्रिया होगी। इसी वजह से मामला सिर्फ चुनाव आयोग की तकनीकी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे वोटिंग राइट्स से जुड़ जाता है।
तकनीकी बदलाव भी सवालों में
याचिकाओं में SIR के दौरान इस्तेमाल होने वाले तकनीकी बदलावों पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी भी योग्य मतदाता का नाम केवल तकनीकी या दस्तावेजी परेशानी के कारण न हटे। चुनाव आयोग की ओर से SIR को मतदाता सूची को अपडेट और अधिक सटीक बनाने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। वहीं विपक्ष और याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग आपत्तियां उठाई गई हैं।
मामला क्यों अहम है?
भारत में चुनाव के दौरान मतदाता सूची सबसे अहम दस्तावेजों में से एक होती है। अगर किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में नहीं है, तो वह चुनाव में अपना वोट नहीं डाल सकता। इसलिए SIR को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई का असर बड़ी संख्या में मतदाताओं पर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में अब यह देखना अहम होगा कि अदालत चुनाव आयोग की प्रक्रिया में किसी तरह के बदलाव या अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत महसूस करती है या नहीं। फिलहाल मामला अदालत के सामने है और अंतिम तस्वीर सुनवाई के बाद ही साफ होगी। इस बीच SIR को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज है।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!