ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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लखनऊ में जयंत चौधरी ने दिखाई ताकत
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी तैयारी तेज कर दी है। इसी कड़ी में जयंत चौधरी की पार्टी ने लखनऊ में बड़ा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित कर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश की। यह सम्मेलन ऐसे समय हुआ है, जब समाजवादी पार्टी और जयंत चौधरी के बीच राजनीतिक रिश्तों में पहले के मुकाबले ज्यादा तल्खी दिखाई दे रही है।
लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हुए इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक पहुंचे। खास बात यह रही कि इसमें ब्राह्मण समाज की भी बड़ी भागीदारी देखने को मिली। करीब 1500 ब्राह्मणों को जुटाने की तैयारी की गई थी। पार्टी की यह कवायद इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि उसका पारंपरिक राजनीतिक आधार लंबे समय से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट मतदाताओं के बीच रहा है।
जाट के साथ ब्राह्मणों को जोड़ने की कोशिश
अब पार्टी सिर्फ पश्चिमी यूपी तक अपनी राजनीति सीमित नहीं रखना चाहती। उसकी कोशिश ब्राह्मण, गुर्जर और दूसरे सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने की है। पूर्वांचल के नेता बीके शुक्ला की पार्टी में सक्रियता को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
लखनऊ में सम्मेलन करना भी अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संकेत है। पश्चिमी यूपी से निकलकर राजधानी और पूर्वांचल में अपनी मौजूदगी दिखाने की कोशिश साफ नजर आती है। पार्टी की योजना आने वाले समय में मध्य यूपी, पूर्वांचल और बुंदेलखंड में संगठन को मजबूत करने की भी है।
अखिलेश यादव पर जयंत का सीधा हमला
सम्मेलन में जयंत चौधरी ने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर भी निशाना साधा। उन्होंने चौधरी चरण सिंह की विचारधारा का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी राजनीति सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की थी और जाति के आधार पर समाज को बांटना उनका तरीका नहीं था।
अखिलेश यादव के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वाले राजनीतिक फॉर्मूले पर भी जयंत ने तंज कसा। उन्होंने कहा कि यह PDA नहीं बल्कि “पीड़ा और बौखलाहट” है। जयंत ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में हर घटना को जाति के चश्मे से देखने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ समय पहले अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी की राजनीति को लेकर “चवन्नी को रुपया बनाने” वाला तंज किया था। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच बयानबाजी और तेज हुई है।
3 सितंबर को गुर्जर सम्मेलन
ब्राह्मण समाज के बाद अब गुर्जर वोटरों को जोड़ने की तैयारी भी दिखाई दे रही है। जयंत चौधरी 3 सितंबर को सहारनपुर में गुर्जर सम्मेलन करने वाले हैं। यानी पार्टी एक तरफ जाटों के अपने पुराने आधार को मजबूत रखना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ ब्राह्मण और गुर्जर जैसे वर्गों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
2027 के लिए बदल रहा राजनीतिक समीकरण
जयंत चौधरी ने सम्मेलन में युवाओं, किसानों, शिक्षकों और रोजगार जैसे मुद्दों पर भी जोर दिया। डिफेंस कॉरिडोर के जरिए रोजगार बढ़ाने और युवाओं को कौशल से जोड़ने की बात भी उन्होंने कही।
कुल मिलाकर लखनऊ का यह सम्मेलन सिर्फ एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं था। इसके जरिए 2027 के चुनाव के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश हुई है। अब देखना होगा कि जाटों के साथ ब्राह्मण और गुर्जर वोटरों को जोड़ने की यह रणनीति जमीन पर कितनी असरदार होती है और इसका सबसे बड़ा असर किस राजनीतिक दल पर पड़ता है।
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