ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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जयंत चौधरी के निशाने पर अखिलेश यादव
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से काफी पहले ही नेताओं के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। राष्ट्रीय लोक दल के राष्ट्रीय सम्मेलन में पार्टी अध्यक्ष जयंत चौधरी ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर सीधा हमला बोला। उन्होंने अखिलेश यादव की PDA राजनीति पर सवाल उठाते हुए इसे ‘पीड़ा और बौखलाहट’ से जोड़ दिया।
जयंत चौधरी का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कभी समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के बीच चुनावी तालमेल रहा था। दोनों दलों ने मिलकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी रणनीति बनाई थी। लेकिन अब दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दूरी और बयानबाजी साफ दिखाई दे रही है।
अखिलेश यादव लंबे समय से PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को एक साथ जोड़ने की रणनीति पर जोर देते रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यह सपा के प्रमुख राजनीतिक संदेशों में शामिल रहा।
जयंत चौधरी ने इसी फॉर्मूले पर निशाना साधते हुए कहा कि PDA कोई ऐसा फॉर्मूला नहीं है जो समाज को बांटकर राजनीति करने का रास्ता बने। उन्होंने इसे तंज करते हुए ‘पीड़ा और बौखलाहट’ बताया।
जयंत ने कहा कि उनके दादा और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की राजनीति समाज के अलग-अलग वर्गों को साथ लेकर चलने की थी। उनके मुताबिक किसानों और गांव की राजनीति को किसी एक जाति तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
एक समय जयंत चौधरी और अखिलेश यादव की जोड़ी पश्चिमी यूपी की राजनीति में काफी चर्चा में थी। दोनों दलों ने 2022 के विधानसभा चुनाव में साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले आरएलडी ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया।
राजनीतिक रूप से यह बदलाव काफी बड़ा था। पश्चिमी यूपी में जाट मतदाताओं के बीच जयंत चौधरी का प्रभाव माना जाता है और इसी वजह से उनकी पार्टी की भूमिका कई सीटों पर महत्वपूर्ण हो सकती है।
अब जयंत जिस तरह अखिलेश यादव पर हमला कर रहे हैं, उससे साफ है कि दोनों दलों की राजनीतिक दिशा काफी अलग हो चुकी है।
जयंत चौधरी की राजनीति का पारंपरिक आधार जाट और किसान वर्ग रहा है। लेकिन अब उनकी पार्टी ब्राह्मण, गुर्जर और दूसरे सामाजिक समूहों तक भी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
लखनऊ के राष्ट्रीय सम्मेलन में ब्राह्मण समाज की बड़ी भागीदारी और इसके बाद गुर्जर सम्मेलन की तैयारी को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी पश्चिमी यूपी के साथ प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी अपना संगठन मजबूत करना चाहती है।
यूपी की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से चुनावी रणनीति का बड़ा हिस्सा रहे हैं। ऐसे में जयंत चौधरी का PDA पर हमला और दूसरी जातियों के बीच पहुंच बढ़ाने की कोशिश आने वाले चुनाव में महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि अभी 2027 का चुनाव काफी दूर है और राजनीतिक समीकरण कई बार बदल सकते हैं। लेकिन इतना जरूर है कि जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के बीच बढ़ती तल्खी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को नया रंग दे सकती है।
अब सवाल यही है कि जयंत चौधरी की यह रणनीति कितनी सफल होती है और क्या आरएलडी अपने पुराने जाट आधार के साथ दूसरे वर्गों को भी जोड़ पाती है। अगर ऐसा होता है तो 2027 में पश्चिमी यूपी ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
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