ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल अभी से तेज हो गई है। खासकर दलित वोटों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच रोहिणी घावरी के यूपी की राजनीति में सक्रिय होने की चर्चा ने सबका ध्यान खींचा है। बताया जा रहा है कि स्विट्जरलैंड से भारत लौटने के बाद रोहिणी अब प्रदेश में वाल्मीकि समाज के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ बनाने की कोशिश कर रही हैं। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि उनकी लखनऊ यात्रा के दौरान समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात हो सकती है। अगर यह मुलाकात होती है और आगे किसी तरह का राजनीतिक तालमेल बनता है, तो 2027 के चुनाव से पहले यूपी की दलित राजनीति में नया समीकरण देखने को मिल सकता है।
पश्चिमी यूपी पर खास नजर
रोहिणी घावरी की राजनीतिक सक्रियता का सबसे ज्यादा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देखने को मिल सकता है। बताया जा रहा है कि वह करीब 21 विधानसभा सीटों पर अपना फोकस बढ़ाने की तैयारी में हैं। इनमें आगरा कैंट, एत्मादपुर, जसराना, फिरोजाबाद, मेरठ कैंट, मेरठ शहर, गाजियाबाद, लोनी, अलीगढ़ और खैर जैसी सीटें शामिल हैं। इसके अलावा लखनऊ की कुछ सीटों और कानपुर की सीसामऊ, आर्यनगर और किदवईनगर में भी सक्रियता बढ़ाने की चर्चा है। इन इलाकों में दलित मतदाताओं की संख्या चुनावी नतीजों पर असर डाल सकती है। इसलिए रोहिणी का वाल्मीकि समाज को लेकर अभियान राजनीतिक पार्टियों के लिए नजरअंदाज करने वाला मुद्दा नहीं है।
वाल्मीकि समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात
रोहिणी घावरी लंबे समय से वाल्मीकि समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाती रही हैं। उनका कहना है कि इस समाज को लंबे समय तक सिर्फ सफाईकर्मी की पहचान तक सीमित कर दिया गया, जबकि राजनीति में उसे उसकी आबादी और भूमिका के हिसाब से हिस्सेदारी नहीं मिली। अब वह वाल्मीकि समाज को एक अलग राजनीतिक ताकत के रूप में संगठित करने की कोशिश करती दिखाई दे रही हैं। वह वाल्मीकि समाज से मुख्यमंत्री बनाने का लक्ष्य भी सामने रख रही हैं। अगर वह इस समाज के बीच अपनी पकड़ बनाने में सफल रहती हैं, तो इसका असर यूपी की मौजूदा दलित राजनीति पर पड़ सकता है।
अखिलेश यादव से मुलाकात की चर्चा क्यों अहम?
रोहिणी घावरी के 14 और 15 सितंबर को लखनऊ पहुंचने की चर्चा है। इस दौरान वह वाल्मीकि समाज के लोगों से मुलाकात कर सकती हैं। इसी बीच अखिलेश यादव से उनकी संभावित मुलाकात की खबर ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है। रोहिणी का दावा है कि चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ उनकी लड़ाई में अखिलेश यादव ने उन्हें समर्थन का भरोसा दिया है। हालांकि, समाजवादी पार्टी की ओर से इस समर्थन या संभावित मुलाकात की कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए फिलहाल इसे संभावित राजनीतिक मुलाकात के तौर पर ही देखा जा रहा है।
चंद्रशेखर आजाद के लिए क्यों बढ़ सकती है चुनौती?
रोहिणी घावरी पिछले कुछ समय से नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद पर लगाए गए आरोपों के कारण भी चर्चा में रही हैं। उन्होंने चंद्रशेखर आजाद पर शादी का वादा करके शोषण करने का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि सांसद बनने के बाद चंद्रशेखर ने उनसे दूरी बना ली। रोहिणी ने शिकायत के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं किए जाने का भी आरोप लगाया है। हालांकि, इन आरोपों पर चंद्रशेखर आजाद का पक्ष इस रिपोर्ट में सामने नहीं आया है। इसलिए इन आरोपों को आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, किसी साबित तथ्य के रूप में नहीं।
राजनीतिक तौर पर देखें तो रोहिणी की सक्रियता उसी पश्चिमी यूपी में है, जहां चंद्रशेखर आजाद ने दलित युवाओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है। ऐसे में अगर रोहिणी वाल्मीकि समाज का अलग समर्थन आधार तैयार कर लेती हैं, तो आजाद समाज पार्टी के लिए चुनौती बढ़ सकती है।
2027 में बन सकता है नया दलित समीकरण
यूपी की दलित राजनीति में अब तक जाटव वोट बैंक की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में रही है। मायावती की राजनीति को लंबे समय तक इसी सामाजिक आधार से मजबूती मिली। दूसरी ओर चंद्रशेखर आजाद ने पश्चिमी यूपी में दलित युवाओं के बीच अपनी जगह बनाई है। अब वाल्मीकि समाज को केंद्र में रखकर रोहिणी घावरी की संभावित राजनीतिक सक्रियता एक नया समीकरण बना सकती है। हालांकि इसका असली असर 2027 के विधानसभा चुनाव में ही साफ होगा।
फिलहाल उनकी लखनऊ यात्रा, वाल्मीकि समाज के बीच सक्रियता और अखिलेश यादव से संभावित मुलाकात ने यूपी की दलित राजनीति को जरूर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि रोहिणी किस राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ती हैं और क्या उनका अभियान वास्तव में किसी बड़े चुनावी गठजोड़ का हिस्सा बनता है।
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