ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या और राम मंदिर को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर तीखा हमला किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों दलों के नेताओं को प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था, लेकिन उन्होंने इसमें हिस्सा नहीं लिया। योगी आदित्यनाथ ने यह बात लखनऊ में विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अध्यक्ष अशोक सिंघल की जन्मशताब्दी के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में कही। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने राम मंदिर आंदोलन से जुड़े पुराने राजनीतिक विवादों का भी जिक्र किया।
वोट बैंक की राजनीति का आरोप
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि सपा और कांग्रेस ने राम मंदिर के कार्यक्रम से दूरी इसलिए बनाई क्योंकि उन्हें अपने वोट बैंक की चिंता थी। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों को डर था कि राम मंदिर कार्यक्रम में शामिल होने से उनका एक खास वर्ग का समर्थन प्रभावित हो सकता है। योगी ने राम मंदिर आंदोलन के दौरान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इन दलों ने अतीत में राम मंदिर आंदोलन का विरोध किया था और इसे रोकने की कोशिश की थी। ये मुख्यमंत्री के राजनीतिक आरोप हैं।
आंदोलन और पुरानी राजनीति का जिक्र
अपने भाषण में योगी आदित्यनाथ ने राम जन्मभूमि आंदोलन के पुराने दौर को याद किया। उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान राम मंदिर को लेकर कई तरह के सवाल और विवाद खड़े किए गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि आज कुछ राजनीतिक दल खुद को राम भक्त के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने अपने समर्थकों से राम मंदिर आंदोलन को लेकर सतर्क रहने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश करने वाले लोगों से सावधान रहने की जरूरत है।
2027 से पहले मुद्दा फिर चर्चा में
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव करीब आने के साथ ही राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी तेज होती जा रही है। राम मंदिर ऐसा मुद्दा है जिस पर बीजेपी और विपक्ष के बीच पहले भी कई बार राजनीतिक बहस हो चुकी है। योगी का ताजा बयान इसी राजनीतिक माहौल का हिस्सा माना जा रहा है। दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस की ओर से इन आरोपों पर अलग-अलग प्रतिक्रिया सामने आ सकती है। राम मंदिर का मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। अब चुनावी माहौल बनने के साथ यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में अलग-अलग दल इस मुद्दे को किस तरह उठाते हैं और जनता के सामने किन दूसरे मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं।
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