ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में दुनिया के बड़े एआई विशेषज्ञ एक मंच पर दिखे। इसमें Sam Altman, Demis Hassabis और Dario Amodei जैसे दिग्गज शामिल हुए। सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के भविष्य, सरकारी नीतियों और नैतिक सवालों पर चर्चा हुई। लेकिन एआई का सफर यहां तक पहुंचने के लिए कई दशकों का है। आइए जानते हैं कि एआई की शुरुआत कैसे हुई।
एआई शब्द की शुरुआत कब हुई?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई शब्द पहली बार 1956 में इस्तेमाल किया गया था। इसे गढ़ने वाले थे अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक John McCarthy। उस समय कंप्यूटर नई तकनीक थी और वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि क्या मशीनें भी इंसानों की तरह सोच सकती हैं।
1956 में अमेरिका के Dartmouth College में एक ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसे बाद में डार्टमाउथ कॉन्फ्रेंस के नाम से जाना गया। इसी बैठक में पहली बार “Artificial Intelligence” शब्द का औपचारिक उपयोग हुआ, जिसका उद्देश्य ऐसी मशीनें विकसित करना था जो सीखने, तर्क करने और समस्याओं को हल करने की क्षमता रख सकें।
क्यों चुना गया ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ नाम?
जॉन मैकार्थी और उनके साथी मानते थे कि अगर मशीनें तर्क कर सकती हैं और सीख सकती हैं, तो इसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता कहा जा सकता है। इसलिए उन्होंने Artificial (कृत्रिम) और Intelligence (बुद्धि) शब्दों को मिलाकर नया नाम दिया।
उस दौर में यह विचार काफी साहसी था। कंप्यूटर बहुत साधारण थे और आज जैसी प्रोसेसिंग पावर नहीं थी। लेकिन वैज्ञानिकों का सपना था कि एक दिन मशीनें शतरंज खेलेंगी, भाषा समझेंगी और इंसानों की तरह फैसले लेंगी। यह सोच आगे चलकर सच साबित हुई।
एआई रिसर्च की नींव कैसे पड़ी?
डार्टमाउथ सम्मेलन में कई बड़े वैज्ञानिक शामिल थे। इनमें John McCarthy, Marvin Minsky, Claude Shannon और Allen Newell जैसे नाम थे। इन लोगों ने मिलकर एआई रिसर्च की नींव रखी।
शुरुआती सालों में एआई पर काम धीमा था, लेकिन वैज्ञानिकों का उत्साह कम नहीं हुआ। 1980 के दशक में कंप्यूटिंग पावर बढ़ने लगी और एआई रिसर्च को नई गति मिली। मशीन लर्निंग और डेटा साइंस जैसे क्षेत्र विकसित हुए, जिससे एआई और मजबूत हुआ।
आज के दौर में एआई की भूमिका
आज एआई हर क्षेत्र में इस्तेमाल हो रहा है। हेल्थकेयर में बीमारियों की पहचान, बैंकिंग में फ्रॉड डिटेक्शन और स्मार्टफोन में वॉइस असिस्टेंट—ये सभी एआई के उदाहरण हैं। सेल्फ-ड्राइविंग कारें और रोबोटिक्स भी इसी तकनीक का हिस्सा हैं।
एआई ने जिंदगी को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ नैतिक सवाल भी जुड़े हैं। डेटा प्राइवेसी, नौकरी पर असर और तकनीक का दुरुपयोग—ये मुद्दे आज चर्चा में हैं। इसलिए सरकारें और कंपनियां एआई को जिम्मेदारी से विकसित करने पर जोर दे रही हैं।
एआई का सफर एक छोटे विचार से शुरू हुआ था, लेकिन आज यह दुनिया बदल रहा है। इंडिया-एआई समिट जैसे आयोजन दिखाते हैं कि भारत भी इस तकनीक में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है।
एआई का भविष्य रोमांचक है, लेकिन इसे सही दिशा में इस्तेमाल करना जरूरी है। अगर तकनीक और इंसानियत साथ चलें, तो एआई आने वाले समय में और भी बड़ा बदलाव ला सकता है।
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