ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
बोर्ड परीक्षा का समय बच्चों और माता-पिता दोनों के लिए सबसे तनाव वाला समय होता है। पूरे साल की मेहनत, घर की उम्मीदें, और “एक पेपर में सब बिगड़ न जाए” वाली चिंता—सब एक साथ चलता है। ऐसे वक्त में अगर एडमिट कार्ड जैसी बुनियादी चीज पर विवाद खड़ा हो जाए, तो मामला सिर्फ कागज का नहीं रहता, वह बच्चे की मानसिक हालत और परिवार के भरोसे का मुद्दा बन जाता है।
दिल्ली में इसी तरह का एक विवाद सामने आया, जिसमें निजी स्कूल, फीस, एडमिट कार्ड और सरकार—सब एक ही लाइन में आ गए। राजनीति भी हुई, आरोप भी लगे, और अंत में देर रात तक धरना-प्रदर्शन की बातें भी सामने आईं।
आरोप क्या लगे?
रिपोर्ट
के मुताबिक आम आदमी पार्टी (AAP) ने आरोप लगाया कि एक स्कूल के प्रिंसिपल और मैनेजर बच्चों के एडमिट कार्ड
लेकर शिक्षा मंत्री आशीष सूद के घर देर रात तक बैठे थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि AAP के दिल्ली
अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने पूछा कि शिक्षा मंत्री का स्कूल के प्रिंसिपल से क्या
रिश्ता है और एडमिट कार्ड मंत्री के घर क्यों ले जाए गए।
यह आरोप गंभीर इसलिए बन जाता है क्योंकि शिक्षा से जुड़े मामलों में “सरकार किसके साथ खड़ी है”—यह सवाल तुरंत उठता है। हालांकि यह भी जरूरी है कि आरोप और तथ्य अलग रखे जाएं, क्योंकि राजनीतिक बयान अक्सर तीखे होते हैं।
एडमिट कार्ड रोकने का मुद्दा क्यों उभरा?
रिपोर्ट
के अनुसार AAP का
कहना है कि 10वीं बोर्ड परीक्षा से पहले स्कूल ने कथित तौर
पर कहा कि बढ़ी हुई फीस दोगे तभी एडमिट कार्ड मिलेगा, वरना
नहीं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सौरभ भारद्वाज ने दावा किया कि यह सब
पुलिस के सामने हुआ और इसे “ब्लैकमेलिंग” जैसा बताया गया।
माता-पिता के लिए यह सबसे मुश्किल स्थिति होती है—वे फीस पर सवाल भी करना चाहते हैं, लेकिन बच्चे का भविष्य भी सामने होता है। कई परिवारों में उसी रात घर का माहौल टूट जाता है, क्योंकि बच्चा पढ़ाई छोड़कर तनाव में चला जाता है।
“18 लाख बच्चों के अभिभावक” वाले दावे पर हमला
रिपोर्ट
के मुताबिक सौरभ भारद्वाज ने शिक्षा मंत्री के उस दावे पर भी हमला किया कि वे
दिल्ली के 18 लाख
बच्चों के अभिभावक हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उन्होंने सवाल उठाया कि अगर ऐसा है
तो स्कूल पर एफआईआर क्यों नहीं हुई।
ये बयान राजनीति का हिस्सा हैं, लेकिन इनके पीछे एक बड़ा सवाल छुपा है—क्या सरकारी सिस्टम निजी स्कूलों की मनमानी को रोकने में सक्षम है?
कानूनी एंगल: जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का जिक्र
रिपोर्ट
के मुताबिक सौरभ भारद्वाज ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के सेक्शन 75 का हवाला दिया और कहा कि
परीक्षा से ठीक पहले एडमिट कार्ड रोकना मानसिक उत्पीड़न/क्रूरता की श्रेणी में
माना जा सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उन्होंने पूछा कि इस आधार पर
एफआईआर क्यों नहीं हुई।
यहां एक व्यावहारिक बात समझने की है—कानून का डर तभी काम करता है जब कार्रवाई समय पर दिखे। वरना लोग मान लेते हैं कि नियम किताबों में हैं, जमीन पर नहीं।
“ऊपर वाला” कौन था? आरोप का एक और हिस्सा
रिपोर्ट
के मुताबिक विधायक संजीव झा ने कहा कि स्कूल के प्रिंसिपल ने बातचीत में कहा था कि
“ऊपर से फोन आ जाएगा तो एडमिट कार्ड जारी कर दूंगा”।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बाद में मंत्री के साथ प्रिंसिपल की फोटो
देखकर उन्होंने आरोप लगाया कि “ऊपर वाला” सरकार थी।
ऐसे आरोप माहौल को और गरमा देते हैं, क्योंकि इससे यह संकेत जाता है कि निर्णय स्कूल नहीं, कहीं और से हो रहा था। हालांकि, यह भी आरोप ही है—और इसकी जांच प्रशासनिक प्रक्रिया से ही आ सकती है।
देर रात तक प्रदर्शन और एडमिट कार्ड जारी होने की बात
रिपोर्ट
के मुताबिक विधायक कुलदीप कुमार ने कहा कि वे सुबह 11 बजे से रात 11 बजे तक स्कूल के
बाहर डटे रहे और संकल्प लिया था कि बच्चों को एडमिट कार्ड दिलाकर रहेंगे।
रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि अंत में स्कूल को एडमिट कार्ड
देने पड़े।
अगर सच में बच्चे को परीक्षा से कुछ घंटे पहले एडमिट कार्ड मिले, तो आप सोचिए—उस बच्चे ने उस रात कैसे पढ़ाई की होगी। कई बार नुकसान सिर्फ नंबरों का नहीं होता; बच्चे के आत्मविश्वास पर चोट लगती है।
निजी स्कूल फीस विवाद: असल समस्या कहां है?
दिल्ली ही नहीं, देश के कई शहरों में निजी स्कूल फीस का विवाद आम हो गया है। कई माता-पिता कहते हैं कि फीस बढ़ती जाती है, लेकिन जवाबदेही साफ नहीं होती। स्कूल कहते हैं कि खर्च बढ़ता है, इसलिए फीस जरूरी है। बीच में फंसता है बच्चा।
इसलिए ऐसे मामलों में सरकार, शिक्षा विभाग और स्कूल—तीनों की जिम्मेदारी बनती है कि “एडमिट कार्ड” जैसे अधिकार को फीस विवाद से अलग रखा जाए। फीस पर बहस अलग मंच पर होनी चाहिए, लेकिन परीक्षा/एडमिट कार्ड को हथियार नहीं बनना चाहिए।
आगे क्या जरूरी है?
यह मामला अभी आरोप-प्रत्यारोप के स्तर पर ज्यादा दिखता है, लेकिन एक अच्छी बात यह हो सकती है कि इससे सिस्टम पर दबाव बढ़े—और आगे किसी बच्चे को परीक्षा से पहले एडमिट कार्ड के लिए सड़क पर न खड़ा होना पड़े।
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