अराघची का पलटवार, बोले- समझौता करीब था लेकिन अमेरिका ने बदल दिए नियम
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शांति वार्ता फेल होने के बाद अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पढ़िए कैसे उन्होंने ‘गुडविल’ से लेकर ‘शिफ्टिंग गोलपोस्ट’ तक कई बड़े संकेत दिए।
अराघची का पलटवार, बोले- समझौता करीब था लेकिन अमेरिका ने बदल दिए नियम
  • Category: विदेश

अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में करीब 21 घंटे तक चली शांति वार्ता आखिरकार किसी समझौते तक नहीं पहुंच सकी।

इस असफलता के बाद ईरान ने सीधे अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि वॉशिंगटन की ज्यादा और सख्त मांगों के कारण बात नहीं बन पाई।
इससे साफ हो गया कि वार्ता टूटने के बाद दोनों पक्ष अपनी-अपनी कहानी दुनिया के सामने रखना चाहते हैं।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया पर लंबा संदेश लिखकर कहा कि ईरान ने युद्ध खत्म करने के इरादे से अच्छे मन से बातचीत की थी।
उन्होंने दावा किया कि दोनों पक्ष “इस्लामाबाद समझौते” के बेहद करीब पहुंच गए थे, लेकिन आखिर समय में माहौल बदल गया।
उनके मुताबिक जब समझौता बस कुछ ही दूरी पर था, तभी अमेरिका की तरफ से अतिवादी रुख, बदलते लक्ष्य और नाकाबंदी जैसी बातें सामने आने लगीं।

गुडविल बनाम दुश्मनी

अराघची ने अपने बयान में एक अहम बात कही कि सद्भावना का जवाब सद्भावना से मिलता है और दुश्मनी का जवाब दुश्मनी से।
यह सिर्फ एक भावनात्मक पंक्ति नहीं थी, बल्कि अमेरिका को सीधा संदेश था कि अगर सम्मानजनक बातचीत नहीं होगी तो ईरान भी अपने तरीके से जवाब देगा।
उनकी पूरी भाषा से यह साफ लगा कि तेहरान खुद को बातचीत में गंभीर पक्ष और अमेरिका को नियम बदलने वाला पक्ष दिखाना चाहता है।

ईरान की ओर से यह भी संदेश दिया गया कि इतने लंबे समय बाद उच्च स्तर की गहन वार्ता हुई थी और उसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
अराघची ने 47 वर्षों में हुई इस तरह की गंभीर बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि ईरान ने नेक इरादे से हिस्सा लिया था।
इस बयान का मतलब साफ है, ईरान यह बताना चाहता है कि असफलता का बोझ अकेले उसके सिर पर नहीं डाला जा सकता।

संसद स्पीकर का भी बड़ा बयान

ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने भी वार्ता खत्म होने के बाद आधिकारिक प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा कि बातचीत शुरू होने से पहले ही साफ था कि ईरान के पास नीयत और इच्छा दोनों हैं, लेकिन पिछले दो युद्धों के अनुभवों की वजह से भरोसा बहुत कम है।
उनका कहना था कि विरोधी पक्ष इस दौर की बातचीत में ईरानी प्रतिनिधिमंडल का विश्वास जीतने में नाकाम रहा।

गालिबाफ ने यह भी कहा कि ईरान 9 करोड़ लोगों का एक शरीर है और देश के लोगों ने सर्वोच्च नेतृत्व की सलाह मानते हुए एकजुटता दिखाई है।
उन्होंने बातचीत में शामिल टीम के साथियों का भी आभार जताया और इसे आसान प्रक्रिया नहीं बताया।
इस तरह ईरानी नेतृत्व वार्ता विफल होने के बाद घरेलू मोर्चे पर भी एकता का संदेश देना चाहता दिखा।

सीजफायर का भविष्य भी सवालों में

रिपोर्ट के मुताबिक 40 दिन के संघर्ष के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते के सीजफायर का ऐलान किया था।
पाकिस्तान की अगुवाई में 9 और 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में वार्ता हुई, लेकिन आखिर में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि डील पूरी नहीं हो सकी।
इसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि युद्धविराम कितने दिन टिकेगा और क्या तनाव फिर से खुलकर सामने आएगा।

अगर बातचीत टूटती है और भरोसा खत्म होता है, तो सीजफायर सिर्फ कागजी राहत बनकर रह सकता है।
यही डर अब पूरे क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है, क्योंकि बात सिर्फ एक समझौते की नहीं, बल्कि बड़े टकराव को रोकने की थी।

आगे क्या समझना चाहिए

ईरान की प्रतिक्रिया से यह साफ है कि वह खुद को पीछे हटने वाला पक्ष नहीं दिखाना चाहता।
अराघची और गालिबाफ, दोनों के बयानों में एक बात समान दिखी, भरोसे की भारी कमी।
जब किसी वार्ता में “शिफ्टिंग गोलपोस्ट” और “ब्लॉकेड” जैसे शब्द इस्तेमाल होने लगें, तब समझना चाहिए कि मतभेद बहुत गहरे हैं।

अभी के लिए इतना तय है कि बातचीत टूटने की कहानी दोनों देशों में अलग-अलग ढंग से सुनाई जाएगी।
लेकिन जमीनी सच यही है कि समझौते के करीब पहुंचने का दावा करने के बाद भी दोनों पक्ष खाली हाथ लौटे हैं।

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