ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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यूरोप इन दिनों इतिहास की सबसे भीषण गर्मी का सामना कर रहा है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, ब्रिटेन, इटली, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड और कई अन्य देशों में तापमान ने दशकों पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। कहीं सड़कें पिघल रही हैं, कहीं रेलवे ट्रैक मुड़ रहे हैं, तो कहीं जंगलों में भीषण आग लगी हुई है। हालात इतने गंभीर हैं कि कई देशों में रेड अलर्ट जारी करना पड़ा है और हजारों स्कूल बंद कर दिए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की वजह से यूरोप में इस तरह की हीटवेव अब पहले से ज्यादा बार और ज्यादा खतरनाक रूप में देखने को मिलेगी।
फ्रांस में भीषण गर्मी से करीब 1,000 अतिरिक्त मौतें
फ्रांस की स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार, 24 से 27 जून के बीच भीषण गर्मी के कारण लगभग 1,000 अतिरिक्त लोगों की मौत हुई है। इनमें अधिकांश बुजुर्ग शामिल हैं और बड़ी संख्या में मौतें घरों के अंदर हुईं। राजधानी पेरिस और उसके आसपास के इलाकों में सबसे अधिक प्रभावित लोग सामने आए हैं। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
16 देशों में टूटा तापमान का रिकॉर्ड
यूरोप के कई देशों में इस बार जून महीने की सबसे भीषण गर्मी दर्ज की गई है।
• स्पेन के एंडुजार में तापमान 45.1°C तक पहुंच गया।
• फ्रांस के पिसोस में 44.3°C रिकॉर्ड किया गया।
• जर्मनी के ड्रैविट्ज शहर में 41.5°C तापमान दर्ज हुआ।
• ब्रिटेन में दक्षिणी इंग्लैंड का तापमान 36.4°C तक पहुंच गया।
• डेनमार्क में 37°C तापमान ने 150 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया।
• स्विट्जरलैंड में जून महीने का सबसे अधिक तापमान 38.8°C रिकॉर्ड किया गया।
मौसम एजेंसियों के मुताबिक, रविवार को करीब 19 करोड़ लोग 35°C या उससे अधिक तापमान की चपेट में रहे।
सड़कें पिघलीं, स्कूल बंद, जंगलों में आग
गर्मी का असर केवल लोगों की सेहत तक सीमित नहीं है। फ्रांस, जर्मनी और डेनमार्क में कई सड़कें पिघलने लगी हैं। रेलवे ट्रैक गर्मी के कारण फैल रहे हैं, जिससे ट्रेनों की रफ्तार कम करनी पड़ी है। ब्रिटेन में 1,000 से ज्यादा स्कूल बंद कर दिए गए हैं क्योंकि पुरानी इमारतों में बच्चों और शिक्षकों का बैठना मुश्किल हो गया। स्पेन और पुर्तगाल में भीषण गर्मी और सूखे के कारण जंगलों में बड़े पैमाने पर आग लग गई है। कई इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजना पड़ा है।
ब्रिटेन में बिजली की मांग भी रिकॉर्ड स्तर पर
ब्रिटेन में गर्मी के कारण एयर कंडीशनर और कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इससे पिछले 45 वर्षों में बिजली की सबसे अधिक मांग दर्ज की गई।कई अस्पतालों ने इमरजेंसी घोषित कर दी है क्योंकि हीट स्ट्रोक, सांस की तकलीफ और डिहाइड्रेशन के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं।
जर्मनी और डेनमार्क भी नहीं बचे
आमतौर पर ठंडे मौसम के लिए पहचाने जाने वाले जर्मनी और डेनमार्क भी इस बार रिकॉर्डतोड़ गर्मी झेल रहे हैं। जर्मनी में हाईवे की सड़कें टूटने लगी हैं, जबकि कई खेल प्रतियोगिताएं और संगीत कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं। डेनमार्क में पहली बार 37°C तापमान दर्ज हुआ है। गर्मी से बचने के लिए लाखों लोग समुद्र तटों की ओर निकल पड़े।
इटली और स्विट्जरलैंड में भी संकट
इटली के 18 बड़े शहरों में रेड हीट अलर्ट जारी है। सरकार ने लोगों को दोपहर में घर से बाहर न निकलने की सलाह दी है। वहीं स्विट्जरलैंड में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस साल बर्फ पिघलने की प्रक्रिया सामान्य समय से काफी पहले शुरू हो गई है।
क्यों यूरोप में 40°C बन जाता है बड़ी आपदा?
अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि भारत में 43°C या 45°C तापमान सामान्य माना जाता है, जबकि यूरोप में 40°C पहुंचते ही राष्ट्रीय आपदा जैसी स्थिति क्यों बन जाती है? इसके पीछे कई वैज्ञानिक कारण हैं।
1. इमारतों की बनावट
यूरोप के अधिकांश घर सर्दियों की ठंड को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। उनकी मोटी दीवारें और बंद संरचना गर्मी को बाहर नहीं निकलने देतीं। ऐसे में घर भट्ठी जैसे गर्म हो जाते हैं। भारत में अधिकतर घरों में हवा आने-जाने की व्यवस्था बेहतर होती है, जिससे तापमान कुछ हद तक नियंत्रित रहता है।
2. शरीर की आदत
भारत जैसे गर्म देशों में रहने वाले लोगों का शरीर बचपन से ही अधिक तापमान का आदी होता है। शरीर पसीने के जरिए खुद को जल्दी ठंडा कर लेता है।इसके विपरीत यूरोप के लोगों का शरीर लंबे समय तक ठंडे मौसम का अभ्यस्त रहता है। अचानक अत्यधिक गर्मी आने पर उनके शरीर पर इसका गंभीर असर पड़ता है।
3. हवा में नमी (Humidity)
यूरोप में हीटवेव के दौरान हवा में नमी काफी अधिक होती है। ऐसे में शरीर से निकलने वाला पसीना जल्दी नहीं सूखता और शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता।इसी वजह से 40°C का तापमान वहां 45°C या उससे भी अधिक महसूस होता है।
जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी वजह
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की चरम गर्मी केवल एक मौसमी घटना नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण यूरोप का तापमान दुनिया के औसत तापमान की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है। अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में ऐसी हीटवेव पहले से ज्यादा लंबी, ज्यादा तीव्र और ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं।
यूरोप की मौजूदा हीटवेव केवल मौसम की खबर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है। रिकॉर्ड तापमान, हजारों अतिरिक्त मौतें, जंगलों की आग, पिघलती सड़कें और ठप होती सार्वजनिक सेवाएं यह दिखाती हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी चरम मौसम घटनाएं दुनिया के हर हिस्से में और अधिक सामान्य होती जाएंगी।
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