ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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अमेरिका और ईरान के बीच बने युद्धविराम के माहौल में पाकिस्तान खुद को एक अहम मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इजरायल इस दावे को आसानी से स्वीकार करने के मूड में नहीं दिख रहा। भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने साफ कहा कि उनका देश पाकिस्तान को एक भरोसेमंद पक्ष के रूप में नहीं देखता। यह बयान ऐसे समय आया है जब इस्लामाबाद की तरफ से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि उसने दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।
भरोसे पर सबसे बड़ा सवाल
इजरायली पक्ष का कहना है कि पाकिस्तान की भूमिका को लेकर संदेह इसलिए भी है क्योंकि उसकी छवि एक निष्पक्ष और विश्वसनीय मध्यस्थ की नहीं रही है। रूवेन अजार ने यह भी कहा कि अमेरिका ने अपने कारणों से पाकिस्तान की मध्यस्थता का इस्तेमाल किया हो सकता है, लेकिन इजरायल की अपनी चिंता अलग है। यह बात कूटनीतिक भाषा में कही गई जरूर, लेकिन संदेश काफी सीधा था कि हर वह देश जो बातचीत की मेज पर बैठना चाहता है, जरूरी नहीं कि सभी पक्ष उस पर भरोसा भी करें।
पाकिस्तान क्यों ले रहा है क्रेडिट
पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने युद्धविराम को अपने नेतृत्व की सफलता बताया और कहा कि अब इस्लामाबाद को क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में मान्यता मिल रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि अमेरिका और ईरान दोनों ने पाकिस्तान पर भरोसा दिखाया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल खुद को सफल बताना काफी नहीं होता, दूसरे पक्ष आपको किस नजर से देखते हैं, यह ज्यादा अहम होता है।
भारत का नाम क्यों चर्चा में आया
हाल के दिनों में कुछ अन्य कूटनीतिक टिप्पणियों में यह भी कहा गया कि अगर किसी देश की छवि संतुलित और संवादकारी है, तो वह इस तरह के तनाव में बेहतर भूमिका निभा सकता है। इसी वजह से भारत का नाम भी बातचीत में आया, क्योंकि कई देशों के साथ उसके रिश्ते संतुलित माने जाते हैं। हालांकि इस पूरे मामले में आधिकारिक रूप से कोई नई मध्यस्थ भूमिका तय नहीं हुई है, लेकिन यह जरूर दिखता है कि पाकिस्तान की दावेदारी पर सबकी सहमति नहीं है।
असली खेल छवि का है
पश्चिम एशिया की राजनीति में सिर्फ बयान नहीं चलते, वहां भरोसा, बैकचैनल संपर्क और रणनीतिक संतुलन बहुत मायने रखते हैं। अगर कोई देश एक पक्ष के ज्यादा करीब दिखता है, तो दूसरे पक्ष को उस पर संदेह होना स्वाभाविक है। पाकिस्तान के साथ फिलहाल यही समस्या दिख रही है। एक ओर वह खुद को शांति का संदेशवाहक बताना चाहता है, दूसरी ओर उसके दावों को सभी गंभीरता से नहीं ले रहे।
आगे क्या असर पड़ेगा
इस बयानबाजी का असर सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे यह तय होगा कि आने वाले दिनों में अगर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ती है, तो किन देशों की भूमिका मजबूत होगी और किनकी सीमित रह जाएगी। फिलहाल इतना साफ है कि पश्चिम एशिया के इस संकट में पाकिस्तान को लेकर इजरायल का भरोसा बहुत कम है, और यही बात आने वाले कूटनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
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