ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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दुनिया भर में बढ़ती भू-राजनीतिक तनाव और परमाणु हथियारों की होड़ के बीच रूस ने एक बार फिर न्यूक्लियर वेपन को लेकर बड़ा बयान दिया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि मौजूदा समय में परमाणु हथियार ही ऐसा सबसे प्रभावी माध्यम हैं, जो दुनिया को एक बड़े वैश्विक युद्ध यानी संभावित तीसरे विश्व युद्ध से बचा सकते हैं। रूस का यह बयान ऐसे समय आया है जब यूक्रेन युद्ध जारी है, अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और कई देशों के परमाणु कार्यक्रमों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं जताई जा रही हैं।
क्या बोले क्रेमलिन के प्रवक्ता?
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था लगातार कमजोर होती जा रही है। उनके अनुसार वर्तमान समय में "न्यूक्लियर डिटरेंस" यानी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता ही वह प्रमुख कारण है, जिसकी वजह से बड़े देशों के बीच सीधा युद्ध नहीं हो रहा है। पेस्कोव का मानना है कि यदि परमाणु हथियारों का डर न हो तो दुनिया में बड़े पैमाने पर सैन्य संघर्षों की संभावना बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि फिलहाल विश्व शांति बनाए रखने के लिए इससे अधिक प्रभावी सुरक्षा तंत्र मौजूद नहीं है।
गैर-परमाणु हथियार भी बन सकते हैं उतने ही खतरनाक
अपने बयान में पेस्कोव ने भविष्य की सैन्य तकनीकों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में ऐसी आधुनिक तकनीकें विकसित हो सकती हैं जिनकी विनाशकारी क्षमता परमाणु हथियारों के बराबर हो। हालांकि उन्होंने किसी विशेष देश का नाम नहीं लिया, लेकिन यह संकेत दिया कि तकनीकी विकास भविष्य में युद्ध के स्वरूप को पूरी तरह बदल सकता है। ऐसे हथियार पारंपरिक परमाणु बमों के बिना भी बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकते हैं।
यूक्रेन युद्ध के दौरान बढ़ी परमाणु बहस
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे लंबे युद्ध के दौरान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई बार परमाणु हथियारों का जिक्र कर चुके हैं। पश्चिमी देशों ने इन बयानों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया है कि रूस परमाणु शक्ति का उपयोग राजनीतिक और सैन्य दबाव बनाने के लिए कर रहा है। अमेरिका और यूरोपीय देशों का कहना है कि इस तरह के बयान वैश्विक अस्थिरता को बढ़ा सकते हैं। वहीं रूस का तर्क है कि उसकी परमाणु नीति केवल राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए है।
नई परमाणु संधि पर भी मतभेद
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक नई अंतरराष्ट्रीय परमाणु संधि की वकालत कर रहे हैं, जिसमें चीन को भी शामिल करने की बात कही गई है। लेकिन चीन सार्वजनिक रूप से ऐसे प्रस्तावों को खारिज कर चुका है। रूस का कहना है कि यदि चीन को किसी नई संधि में शामिल किया जाता है, तो ब्रिटेन और फ्रांस जैसे परमाणु हथियार संपन्न देशों को भी इसका हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इससे साफ है कि नई परमाणु संधि को लेकर प्रमुख शक्तियों के बीच अभी भी सहमति नहीं बन पाई है।
न्यू स्टार्ट संधि खत्म होने से बढ़ी चिंता
परमाणु हथियारों को लेकर वैश्विक चिंता का एक बड़ा कारण रूस और अमेरिका के बीच हुई न्यू स्टार्ट (New START) संधि का समाप्त होना भी है। 2010 में हुई इस संधि के तहत दोनों देशों को अधिकतम 1,550 तैनात परमाणु वॉरहेड रखने की सीमा तय की गई थी। यह शीत युद्ध के बाद परमाणु हथियारों को नियंत्रित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण संधियों में से एक मानी जाती थी। संधि समाप्त होने के बाद अब पहली बार ऐसी स्थिति बनी है जब दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों के बीच हथियारों की संख्या को नियंत्रित करने वाला कोई सक्रिय समझौता मौजूद नहीं है।
रूस का ताजा बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था कई चुनौतियों का सामना कर रही है। परमाणु हथियारों को शांति का माध्यम मानने और उन्हें वैश्विक खतरा समझने वाली सोच के बीच बहस लगातार जारी है। हालांकि एक बात स्पष्ट है कि न्यू स्टार्ट संधि के समाप्त होने और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण दुनिया में परमाणु सुरक्षा को लेकर चिंताएं पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं।
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