ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और वैश्विक सप्लाई चेन में आई रुकावटों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बड़ा फैसला लिया है। अमेरिका से विशेष छूट मिलने के बाद भारतीय कंपनियों ने रूस से करीब 3 करोड़ बैरल कच्चा तेल खरीदने का सौदा किया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब मध्य पूर्व में तनाव के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है और वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से बढ़ी परेशानी
विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है। इसके प्रभावित होने से सऊदी अरब और इराक जैसे देशों से भारत आने वाली तेल की सप्लाई लगभग रुक गई है।
अमेरिकी छूट के बाद बदला फैसला
पिछले कुछ समय से अमेरिका के दबाव के कारण भारत ने रूस से तेल की खरीद कम कर दी थी। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए अमेरिका ने भारत को विशेष छूट दे दी है। इस छूट के तहत 5 मार्च से पहले जहाजों पर लोड किए गए रूसी तेल को भारतीय कंपनियां खरीद सकती हैं। इस अनुमति के बाद भारतीय रिफाइनरों ने तेजी से सौदे करने शुरू कर दिए।
इंडियन ऑयल और रिलायंस ने की बड़ी खरीद
छूट मिलते ही भारतीय कंपनियों ने स्पॉट मार्केट में उपलब्ध रूस के लगभग सभी अनसोल्ड कार्गो खरीद लिए। सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने करीब 1 करोड़ बैरल कच्चा तेल खरीदा है। वहीं भारत की निजी ऊर्जा कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने भी कम से कम इतनी ही मात्रा में तेल खरीदने का सौदा किया है। इसके अलावा रूस के विभिन्न ग्रेड जैसे Urals, ESPO और Varandey के लिए भी बाजार में काफी प्रतिस्पर्धा देखी जा रही है।
टैंकरों ने बदला अपना रास्ता
अमेरिकी छूट के बाद कई रूसी तेल टैंकरों ने अपना रास्ता बदल दिया है। जानकारी के अनुसार 'Maylo' और 'Sarah' नाम के दो टैंकर पहले सिंगापुर की ओर जा रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने दिशा बदलकर भारत की ओर रुख कर लिया। इससे साफ है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत रूस के लिए बड़ा खरीदार बनकर उभरा है।
कीमतों में आया बड़ा बदलाव
मिडिल ईस्ट संकट का असर रूसी तेल की कीमतों पर भी पड़ा है। यूक्रेन युद्ध के दौरान जो रूसी तेल भारी छूट पर मिलता था, अब वह $2 से $8 प्रति बैरल के प्रीमियम पर बिक रहा है। यह कीमतें लंदन के डेटेड ब्रेंट बेंचमार्क के आधार पर तय की जा रही हैं। इससे साफ है कि वैश्विक बाजार में तेल की मांग और आपूर्ति का संतुलन तेजी से बदल रहा है।
पिछले महीनों में घट गई थी खरीद
भारत और रूस के बीच तेल व्यापार में पिछले कुछ महीनों में उतार-चढ़ाव देखा गया है। 2024 के मध्य में भारत रूस से रोजाना करीब 20 लाख बैरल तेल आयात कर रहा था, लेकिन फरवरी 2026 तक यह घटकर लगभग 10.6 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था। इसकी मुख्य वजह अमेरिका द्वारा रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया जाना था, जिससे भुगतान और लेनदेन में दिक्कतें आने लगी थीं।
ऊर्जा सुरक्षा बनी पहली प्राथमिकता
विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने से भारत के लिए सऊदी अरब और इराक से तेल मंगाना मुश्किल हो गया है। ऐसे में रूस से की गई यह बड़ी खरीद भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
इससे देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है। साथ ही यह कदम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी अहम है, क्योंकि ऊर्जा की स्थिर आपूर्ति देश के उद्योग और परिवहन क्षेत्र के लिए बेहद जरूरी होती है।
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