ईरान-इजराइल जंग का असर: कच्चे तेल में भारी उछाल, भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा होने का खतरा
अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 3.5 साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। ब्रेंट क्रूड 116 डॉलर प्रति बैरल हो गया है, जिसका असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है।
ईरान-इजराइल जंग का असर: कच्चे तेल में भारी उछाल, भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा होने का खतरा
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पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। इस संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। 9 मार्च को ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत बढ़कर 116 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो पिछले लगभग साढ़े तीन साल का सबसे ऊंचा स्तर है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह बढ़ोतरी सिर्फ शुरुआत हो सकती है। अगर क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है तो कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है।

 

10 दिनों में 60% तक महंगा हुआ कच्चा तेल

28 फरवरी को पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से अब तक कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। सिर्फ 10 दिनों के अंदर तेल की कीमतों में लगभग 60% तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। इससे पहले 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचा था।

 

तेल बाजार में यह तेजी इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि इससे दुनिया भर में महंगाई बढ़ सकती है और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।

 

'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' बंद होने का बड़ा असर

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की सबसे बड़ी वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का लगभग बंद होना है। यह लगभग 167 किलोमीटर लंबा समुद्री मार्ग है जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के लिए यह रास्ता बेहद अहम माना जाता है क्योंकि वैश्विक पेट्रोलियम आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

 

वर्तमान युद्ध के कारण यह समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गया है। खतरे को देखते हुए कई तेल टैंकर इस रास्ते से गुजरने से बच रहे हैं। जानकारों के अनुसार दुनिया के कुल पेट्रोलियम का करीब 20% हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। इसलिए अगर यह रास्ता बंद हो जाता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है।

 

भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए भी अहम है यह रास्ता

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज केवल पश्चिम एशिया के देशों के लिए ही नहीं बल्कि भारत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 50% कच्चा तेल और करीब 54% एलएनजी (LNG) इसी समुद्री मार्ग के जरिए आयात करता है।

 

सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे बड़े तेल उत्पादक देश भी अपने निर्यात के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं। ऐसे में इस रूट पर खतरा बढ़ने से भारत समेत कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।

 

ऑयल रिफाइनरियों पर ड्रोन हमलों से बढ़ी चिंता

तेल की कीमतों में तेजी का एक और बड़ा कारण पश्चिम एशिया के कई देशों की तेल सुविधाओं पर हुए हमले हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने अमेरिका और इजराइल के हमलों के जवाब में कतर, सऊदी अरब और कुवैत की तेल सुविधाओं पर ड्रोन हमले किए हैं।

 

इन हमलों के कारण कई जगह उत्पादन प्रभावित हुआ है और कुछ देशों को अपने तेल उत्पादन में कटौती करनी पड़ी है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष जारी रहता है तो क्षेत्र के अन्य ऊर्जा ठिकानों को भी निशाना बनाया जा सकता है। इससे वैश्विक तेल बाजार में और अस्थिरता बढ़ सकती है।

 

भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा होने की आशंका

कच्चे तेल की कीमतों में इस उछाल का असर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो भारत में पेट्रोल-डीजल 5 से 6 रुपये प्रति लीटर तक महंगा हो सकता है। हालांकि सरकार का कहना है कि फिलहाल देश में तेल की पर्याप्त आपूर्ति मौजूद है और तुरंत किसी बड़े संकट की संभावना नहीं है।

 

भारत के पास कितना है तेल का बैकअप?

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास पर्याप्त रणनीतिक तेल भंडार मौजूद है। अगर किसी कारण से तेल की आपूर्ति पूरी तरह रुक भी जाए तो भी देश की सप्लाई चेन करीब 7 से 8 सप्ताह तक बिना किसी बड़ी समस्या के चल सकती है। इसका मतलब है कि अल्पकालिक संकट की स्थिति में भी भारत को तुरंत पेट्रोल या डीजल की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

 

रूस से तेल खरीदने को मिली छूट

इस बीच अमेरिका ने भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए सीमित अवधि की छूट भी दी है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के अनुसार अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिन का विशेष लाइसेंस दिया है। इसका उद्देश्य वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति को स्थिर बनाए रखना है।

 

रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना शुरू किया था। हालांकि अमेरिका समय-समय पर भारत पर इस खरीद को कम करने का दबाव बनाता रहा है।

 

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें चार साल से स्थिर

दिलचस्प बात यह है कि भारत में पिछले चार सालों से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। इसके विपरीत पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतें करीब 55% और जर्मनी में 22% तक बढ़ चुकी हैं। हालांकि हाल ही में भारत में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत बढ़ाई गई है। दिल्ली में 14.2 किलोग्राम का LPG सिलेंडर अब 913 रुपये में मिल रहा है, जबकि पहले इसकी कीमत 853 रुपये थी।

 

वहीं 19 किलोग्राम के कॉमर्शियल सिलेंडर की कीमत 1883 रुपये हो गई है, जो पहले से 115 रुपये ज्यादा है।

 

आने वाले दिनों में क्या हो सकता है असर?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव जल्द खत्म नहीं हुआ तो वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। ऐसी स्थिति में तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं और आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।

 

भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। हालांकि फिलहाल सरकार का दावा है कि देश के पास पर्याप्त तेल भंडार है और आपूर्ति को बनाए रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं।

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