ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
देश की राजनीति और सोशल मीडिया की बहसों में एक बार फिर तेज आग लग गई है। वजह है तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामभद्राचार्य का बयान, जिसमें उन्होंने दिल्ली दंगों के आरोपियों को जमानत न मिलने पर कड़ी सजा की मांग की। उनके इस बयान के बाद समर्थन और विरोध—दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कुछ लोग इसे “कड़ा संदेश” मान रहे हैं, तो कुछ लोग इसे “भड़काऊ बयान” कहकर सवाल उठा रहे हैं।
इस पूरे मामले की खास बात यह है कि यह सिर्फ एक मुद्दे तक सीमित नहीं रहा। बातचीत के दौरान उन्होंने कई अलग-अलग विषयों पर अपनी राय रखी—दिल्ली दंगों के आरोपी, JNU में नारेबाजी, राहुल गांधी की विदेश में कही बातों पर सरकार का रुख, बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों का मुद्दा, IPL में बांग्लादेशी खिलाड़ी की एंट्री, और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ को लेकर टिप्पणी। यही वजह है कि बयान चर्चा के केंद्र में आ गया है।
दिल्ली दंगों के आरोपियों पर क्या कहा?
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने कहा कि
दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं मिलना “बहुत अच्छा”
है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि सिर्फ उम्रकैद नहीं, बल्कि उन्हें मृत्युदंड तक दिया जाना चाहिए। इस लाइन के सामने आते ही
मामला सीधे “कानून-व्यवस्था” से निकलकर “राजनीतिक बहस” में पहुंच गया। क्योंकि
दंगों और उनसे जुड़े केस पहले से ही देश में बेहद संवेदनशील मुद्दा रहे हैं।
यहां एक बात समझना जरूरी है कि जमानत, सजा और अदालत की प्रक्रिया अलग-अलग चीजें हैं। लेकिन जब किसी प्रभावशाली धार्मिक-राजनीतिक हस्ती की तरफ से इतनी सख्त बात आती है, तो उसका असर सार्वजनिक चर्चा पर साफ दिखता है। लोग अपने-अपने नजरिए से इसे न्याय की मांग कह रहे हैं या फिर बदले की भाषा।
JNU को लेकर बयान
JNU को लेकर भी उन्होंने तीखी टिप्पणी
की। उन्होंने कहा कि JNU पर नियंत्रण करना जरूरी है और वहां
के लोग “सीमाएं पार कर गए हैं।” यह बयान उन पुराने विवादों की तरफ इशारा करता है,
जिनमें JNU में नारेबाजी और देशविरोधी नारों
का आरोप लगते रहे हैं। इस विषय पर देश में पहले से दो धड़े बनते रहे हैं—एक तरफ वे
लोग जो इसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ते हैं, और दूसरी तरफ
वे जो इसे राष्ट्रविरोधी गतिविधि मानते हैं।
उनके बयान के बाद यह बहस फिर से तेज हो सकती है कि यूनिवर्सिटी कैंपस में नारेबाजी, विरोध-प्रदर्शन और राजनीतिक गतिविधियों की सीमा क्या होनी चाहिए, और सरकार/प्रशासन का रोल कितना होना चाहिए।
राहुल गांधी पर क्या बोले?
राहुल गांधी को लेकर भी उन्होंने कड़ा
रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि विदेश में राहुल गांधी द्वारा भारतीय संस्थाओं पर
सवाल उठाए जाने पर सरकार को कठोर कदम उठाने चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि
राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष के पद से हटा देना चाहिए। इस बयान के बाद स्वाभाविक
है कि राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ी, क्योंकि
नेता प्रतिपक्ष का पद लोकतंत्र में बड़ी भूमिका निभाता है।
यह मुद्दा अक्सर देश की राजनीति में उठता रहा है कि विदेश में जाकर देश की आलोचना करना सही है या नहीं। समर्थक कहते हैं कि सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, जबकि विरोधी इसे देश की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला मानते हैं।
अमेरिका के टैरिफ पर प्रतिक्रिया
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
द्वारा “दोगुना टैरिफ” लगाने की बात कहे जाने पर भी जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने
प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि भारत इससे झुकने वाला नहीं है और भारत अमेरिका के
दबाव में नहीं आएगा। इस बयान को कुछ लोग राष्ट्रहित में “सख्त स्टैंड” के तौर पर
देख रहे हैं, तो कुछ लोग इसे राजनीतिक बयानबाजी
मान रहे हैं।
टैरिफ जैसे मुद्दे आम लोगों तक सीधे “महंगाई, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट और व्यापार” के जरिए असर डालते हैं। इसलिए जब इस पर बयान आता है, तो चर्चा सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहती—व्यापार और अर्थव्यवस्था के नजरिए से भी लोग सवाल करने लगते हैं।
ममता बनर्जी और ‘हिंदू राष्ट्र’ पर
टिप्पणी
उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री
ममता बनर्जी को लेकर कहा कि वह पूरी तरह से मुसलमानों का समर्थन कर रही हैं। वहीं
“हिंदू राष्ट्र” पर उन्होंने कहा कि वे हिंदू राष्ट्र चाहते हैं और इसके लिए जनमत
संग्रह होना चाहिए। साथ ही उन्होंने एक राजनीतिक संकेत भी दिया कि अगर 370
सीटें “रामभक्तों” को मिल जाएं, तो हिंदू
राष्ट्र बनाना आसान होगा। इस हिस्से ने बयान को और ज्यादा राजनीतिक रंग दे दिया।
ऐसे बयान अक्सर चुनावी मौसम में ज्यादा चर्चा पकड़ते हैं, क्योंकि इन्हें सीधा वोट, ध्रुवीकरण और चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जाता है।
बांग्लादेश,
IPL और शाहरुख खान वाला एंगल
बांग्लादेश में हिंदुओं पर कथित हमलों को लेकर उन्होंने सरकार से कठोर कदम उठाने की बात कही और वहां की अंतरिम सरकार पर भरोसा न होने की बात भी कही। इसी के साथ उन्होंने IPL में बांग्लादेशी खिलाड़ी के शामिल होने पर अभिनेता शाहरुख खान को दोषी बताया और सवाल उठाया कि जब वहां हिंदुओं की हत्या हो रही है, तो खिलाड़ी को क्यों बुलाया जा रहा है। यह बयान इसलिए भी वायरल हो सकता है क्योंकि इसमें धर्म, पड़ोसी देश, और क्रिकेट—तीनों की भावनाएं जुड़ जाती हैं।
अतिक्रमण हटाने के दौरान हमले पर क्या
बोले?
उन्होंने अतिक्रमण हटाने के दौरान हो रहे हमलों को “सोची-समझी साजिश” बताया। यह टिप्पणी भी ऐसे समय में आई है जब कई शहरों में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर तनाव और विरोध की खबरें आती रहती हैं।
बयान के बाद बहस क्यों तेज है?
इस पूरे बयान में कई ऐसे मुद्दे हैं
जो पहले से समाज में संवेदनशील रहे हैं—दंगे, जमानत-सजा,
छात्र राजनीति, विदेश नीति, पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, और धार्मिक
पहचान से जुड़ी राजनीति। इसलिए बयान आते ही लोगों ने अपनी-अपनी तरफ से इसे पकड़
लिया। कोई इसे “देशहित” कह रहा है, कोई “कट्टरता”, और कोई “राजनीतिक बयान”।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प
होगा कि राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और आम
लोग इस बयान पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं, और क्या इस पर
कोई औपचारिक जवाब या विवाद आगे बढ़ता है।
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