सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को 2020 दिल्ली दंगों के मामले में जमानत देने से इनकार किया। मामला मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय चर्चा में।
 सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत से किया इनकार
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भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 5 जनवरी 2025 को पूर्व छात्र नेता उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक जेल में रहना अपने आप में जमानत का आधार नहीं बन सकता। उमर खालिद पिछले पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं और उन पर 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने का आरोप है।

 

इस फैसले के बाद पाकिस्तान की मीडिया में भी इस खबर को प्रमुखता से कवर किया गया। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि जमानत देने का फैसला केवल कैद की लंबाई पर आधारित नहीं हो सकता।

गिरफ्तारी का पूरा मामला

 

उमर खालिद को सितंबर 2020 में UAPA (कड़े आतंकवाद विरोधी कानून) के तहत गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद से वह लगातार जेल में हैं। हालांकि उन्हें कुछ समय के लिए पारिवारिक शादियों में शामिल होने की अनुमति मिली थी।

 

यह मामला फरवरी 2020 के दिल्ली सांप्रदायिक दंगों से जुड़ा है। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी। पुलिस का आरोप है कि उमर खालिद ने दंगों से पहले भड़काऊ भाषण दिए और हिंसा की साजिश में शामिल थे। इसी मामले में शरजील इमाम को भी जमानत से इनकार किया गया, जबकि इस केस के अन्य 5 आरोपियों को कोर्ट ने जमानत दी।

मानवाधिकार संगठनों की चिंता

 

उमर खालिद की लंबी कैद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के लिए चिंता का विषय रही है। एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित सात संगठनों ने उनकी रिहाई की मांग की थी। एमनेस्टी का कहना था कि उमर खालिद की लगातार हिरासत भारत की न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है और यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सिद्धांतों के खिलाफ है।

 

संगठनों ने यह भी कहा कि किसी भी व्यक्ति को साबित अपराध के बिना इतनी लंबी जेल में नहीं रखा जाना चाहिए। उनके बयान ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना दिया।


 

CAA विरोध प्रदर्शन से जुड़ाव

उमर खालिद की गिरफ्तारी नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों के कुछ महीनों बाद हुई थी। यह कानून 2019 में लाया गया था और इसमें तीन पड़ोसी देशों के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की सुविधा दी गई, जबकि मुस्लिमों को इससे बाहर रखा गया।

 

2022 में जेल से उमर खालिद ने एक खुला पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें सालों तक जेल में रखा जा सकता है, बिना यह साबित किए कि उन्होंने कोई अपराध किया है। यह पत्र उनकी स्थिति और न्याय व्यवस्था पर उनकी नाराजगी को दर्शाता है।

 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह स्पष्ट करता है कि न्यायिक प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन जमानत केवल कैद की अवधि पर नहीं दी जा सकती। उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले ने भारत में न्याय, मानवाधिकार और राजनीतिक आंदोलनों के बीच संवेदनशील संतुलन को उजागर किया है। यह मामला अब भी अंतरराष्ट्रीय ध्यान का केंद्र बना हुआ है, और आने वाले समय में इसके राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक प्रभाव पर गहरी बहस हो सकती है।


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