ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा सेक्टर-150 में 16 जनवरी की रात हुई दर्दनाक घटना में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत के मामले में कोर्ट ने निर्माता बिल्डर निर्मल सिंह को अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने प्रारंभिक जांच के आधार पर पाया कि आरोपी की घटना में प्रत्यक्ष या जानबूझकर कोई भूमिका सिद्ध नहीं होती।
घटना का विवरण
घटना रात के समय हुई जब युवराज मेहता की कार निर्माणाधीन साइट पर खोदे गए जलमग्न गड्ढे में जा गिरी। 34 वर्षीय इंजीनियर कार की छत पर लगभग दो घंटे तक खड़े होकर मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन समय पर कोई सहायता नहीं मिलने के कारण उनकी डूबकर मौत हो गई। यह गड्ढा बेसमेंट में भरे पानी से भरा था और इसके आसपास कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी।
कोर्ट का आदेश और शर्तें
जिला एवं सत्र न्यायाधीश अतुल श्रीवास्तव की अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद बिल्डर को अग्रिम जमानत दी। अदालत ने कहा कि प्रारंभिक स्तर पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है जिससे आरोपी की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी साबित हो।
कोर्ट ने कुछ शर्तें भी रखी हैं:
• आरोपी बिना अदालत की अनुमति देश नहीं छोड़ेंगे।
• जांच में पूरा सहयोग करेंगे।
आरोपी पक्ष की दलील
निर्मल सिंह के वकील मनोज भाटी बोड़ाकी और शोभाराम चंदील ने कोर्ट को बताया कि:
• उनके मुवक्किल का नाम एफआईआर में स्पष्ट रूप से नहीं है।
• उन्होंने कोई प्रत्यक्ष कृत्य नहीं किया।
• आरोपी कंपनी के निदेशक या प्रमुख प्रबंधकीय पद पर नहीं थे।
• कंपनी के अधिकांश शेयर पहले ही दूसरी कंपनी को हस्तांतरित किए जा चुके थे।
कोर्ट ने रिकॉर्ड की समीक्षा कर पाया कि विवादित भूमि पर आरोपी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित नहीं होता। साथ ही निर्माण स्थल पर दो वर्ष से अधिक समय से प्राधिकरण द्वारा कार्यबंदी लागू थी।
अभियोजन पक्ष का तर्क
अभियोजन ने कहा कि आरोपी कंपनी के प्रमोटर रहे हैं, इसलिए उनकी जिम्मेदारी बनती है। कोर्ट ने कहा कि केवल ‘प्रमोटर’ होने के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती, जब तक कि स्पष्ट विधिक दायित्व रिकॉर्ड पर सिद्ध न हो।
परिवार की न्याय की मांग
युवराज मेहता के परिवार ने घटना के बाद से सख्त कार्रवाई और न्याय की मांग की है। मृतक के परिजन इस मामले में न्याय की उम्मीद में अदालत और प्रशासन के संपर्क में हैं।
आगे की कानूनी प्रक्रिया
अभी मामला जांच के अधीन है। एसआईटी रिपोर्ट का इंतजार जारी है और कोर्ट के आदेश के बाद बिल्डर को हिरासत में लेने की आवश्यकता नहीं मानी गई। मामले की अगली सुनवाई में जांच रिपोर्ट और सबूतों की समीक्षा होगी, जिसके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय होगी।
यह मामला निर्माणाधीन स्थलों की सुरक्षा और जिम्मेदारी की गंभीरता को उजागर करता है। साथ ही, यह दिखाता है कि कानूनी प्रक्रिया में आरोपी की भूमिका, प्रत्यक्ष प्रमाण और जिम्मेदारी का स्पष्ट होना आवश्यक है। परिवार की न्याय की मांग और अदालत की सतर्कता इस मामले में समाज और प्रशासन दोनों के लिए सीख देती है।
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