ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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गाजियाबाद के हरीश राणा, जिन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति मिली थी, उनकी अस्थियों का शुक्रवार को हरिद्वार में गंगा नदी में विसर्जन किया गया। इस दौरान परिवार के सदस्य और करीबी रिश्तेदार मौजूद रहे। अस्थि विसर्जन से पहले परिवार ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और फिर गंगा में अस्थियां प्रवाहित कीं। माहौल बेहद भावुक रहा और हर किसी की आंखें नम थीं।
अंतिम संस्कार का भावुक दृश्य
दो दिन पहले, 25 मार्च को दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट पर हरीश का अंतिम संस्कार किया गया था। सुबह 9:40 बजे उनके छोटे भाई आशीष ने मुखाग्नि दी। इस दौरान पिता अशोक राणा ने खुद को संभालते हुए कहा कि इस समय कोई नहीं रोए। उन्होंने बेटे को अंतिम प्रणाम करते हुए हिम्मत बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन माहौल बेहद मार्मिक था।
परिवार ने जताया आभार
अस्थि विसर्जन के मौके पर हरीश के पिता अशोक राणा ने सभी का धन्यवाद किया। उन्होंने डॉक्टरों, प्रशासन और समाज के लोगों का विशेष आभार व्यक्त किया, जिन्होंने इस कठिन समय में उनका साथ दिया। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी धन्यवाद किया। उनके निर्देश पर जिला प्रशासन और अन्य अधिकारियों ने परिवार की हर संभव मदद की। इसके अलावा, उन्होंने सरकार द्वारा दी गई 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता के लिए भी आभार जताया।
डॉक्टरों और सहयोगियों का भी धन्यवाद
परिवार ने AIIMS Delhi के डॉक्टरों और मेडिकल टीम का भी आभार जताया, जिन्होंने इलाज के दौरान लगातार सहयोग किया। साथ ही अधिवक्ताओं, पड़ोसियों और समाज के लोगों का भी धन्यवाद किया गया, जिन्होंने इस मुश्किल समय में परिवार का साथ निभाया।
13 साल से कोमा में थे हरीश
31 वर्षीय हरीश राणा पिछले 13 सालों से कोमा में थे। 24 मार्च को उन्होंने दिल्ली एम्स में अंतिम सांस ली। डॉक्टरों के अनुसार, उनके परिवार ने उनके अंग—फेफड़े, किडनी और कॉर्निया—दान करने का भी फैसला लिया, जिससे कई लोगों को नई जिंदगी मिल सकेगी।
क्या है इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)?
हरीश को पैसिव यूथेनेशिया दिया गया था। इसका मतलब है कि मरीज को जिंदा रखने के लिए जो लाइफ सपोर्ट सिस्टम होता है, उसे हटा लिया जाता है, ताकि वह प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त हो सके। यह फैसला तब लिया जाता है, जब मरीज लंबे समय से गंभीर अवस्था में हो और उसके ठीक होने की संभावना बेहद कम हो।
सुप्रीम कोर्ट से मिली थी अनुमति
हरीश राणा का मामला देश में एक मिसाल बन गया है। उनके परिवार ने इच्छामृत्यु के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अनुमति दी थी। इसके बाद 14 मार्च को हरीश को गाजियाबाद से दिल्ली एम्स में शिफ्ट किया गया और 16 मार्च को उनकी फीडिंग ट्यूब हटा दी गई।
हरीश राणा की कहानी एक लंबे संघर्ष, दर्द और साहस की कहानी है। उनकी इच्छामृत्यु और उसके बाद की घटनाएं न सिर्फ एक परिवार के भावनात्मक सफर को दिखाती हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि कठिन परिस्थितियों में मानवीय संवेदनाएं और निर्णय कितने महत्वपूर्ण होते हैं।
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