ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव आते ही हर पार्टी अपने तरीके से जमीन मजबूत करने में जुट जाती है। इसी माहौल में AIMIM ने भी संगठन विस्तार और सदस्यता अभियान को तेज करने का दावा किया है। पार्टी नेताओं के मुताबिक उत्तर प्रदेश में उसकी सदस्यता तेजी से बढ़ी है और पिछले महीनों में बड़ी संख्या में नए लोग जुड़े हैं।
चुनाव से
पहले तेज हुई तैयारी
एक रिपोर्ट के अनुसार अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और इसी वजह
से प्रदेश की राजनीति का तापमान अभी से बढ़ने लगा है। ऐसे समय में AIMIM खुद को सिर्फ बयान देने वाली पार्टी नहीं, बल्कि बूथ
स्तर तक पहुंच बनाने वाली ताकत के रूप में पेश करना चाहती है। पार्टी की तरफ से यह
भी कहा गया कि सदस्यता में बढ़ोतरी अचानक नहीं हुई, बल्कि
जमीनी नाराजगी और स्थानीय मुद्दों की वजह से लोगों का रुझान बढ़ा है।
सदस्यता
पर बड़े दावे
पार्टी के कुछ नेताओं ने दावा किया है कि उत्तर प्रदेश में सदस्यता
करोड़ के स्तर तक पहुंच चुकी है, जबकि कुछ रिपोर्टों में यह
भी कहा गया कि बीते छह महीनों में लाखों नए लोग जुड़े हैं। राजनीति में ऐसे दावे
अक्सर रणनीति का हिस्सा भी होते हैं, लेकिन यह बात जरूर
दिखती है कि पार्टी अपने विस्तार को जोर-शोर से प्रचारित करना चाहती है। यही वजह
है कि अब चर्चा सिर्फ AIMIM की उपस्थिति पर नहीं, बल्कि उसके संभावित असर पर भी होने लगी है।
किन
इलाकों पर नजर
रिपोर्टों के मुताबिक पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक
बैठकें की जा रही हैं और स्थानीय मुद्दों को सामने लाने की तैयारी है। इससे साफ है
कि पार्टी सिर्फ एक खास क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि
पूरे राज्य में अपनी पकड़ दिखाने की कोशिश कर रही है। अगर यह रणनीति लगातार चलती
रही, तो कई सीटों पर वोटों का बंटवारा बदल सकता है और इससे
पुराने सियासी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
दूसरी
पार्टियों पर असर
AIMIM की सक्रियता का सबसे बड़ा असर उन दलों पर पड़ सकता है जो अब
तक खुद को कुछ खास समुदायों और क्षेत्रों का स्वाभाविक प्रतिनिधि मानते रहे हैं।
एक रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया कि इस बढ़ती सक्रियता से दूसरे विपक्षी दलों की
चिंता बढ़ सकती है। हालांकि चुनावी नतीजे सिर्फ सदस्यता से तय नहीं होते, लेकिन संगठन, चेहरा, मुद्दा और
लगातार मौजूदगी मिलकर असर जरूर बनाते हैं।
जमीन और
हवा में फर्क
राजनीति में यह भी सच है कि सदस्यता अभियान की गूंज और वोट में
बदलने वाली ताकत हमेशा एक जैसी नहीं होती। कोई भी पार्टी लाखों या करोड़ों सदस्यों
का दावा कर सकती है, लेकिन असली परीक्षा चुनाव के दिन होती
है। फिर भी, अगर कोई दल गांव-कस्बे तक बैठकें कर रहा हो,
नए लोग जोड़ रहा हो और स्थानीय नाराजगी को मुद्दा बना रहा हो,
तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
अगले
महीनों में तस्वीर साफ होगी
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में संगठन विस्तार का मतलब सिर्फ
पोस्टर और बयान नहीं होता, बल्कि लगातार फील्ड में काम करना होता
है। अभी जो तस्वीर दिख रही है, वह यह है कि AIMIM आने वाले चुनाव को गंभीरता से ले रही है और अपनी जगह बनाने के लिए लंबी
तैयारी कर रही है। अगले महीनों में यह साफ होगा कि यह अभियान सिर्फ चर्चा तक सीमित
रहता है या सच में चुनावी असर पैदा करता है।
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