ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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असम में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल तेजी से गरमाता जा रहा है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के बीच जुबानी जंग ने इस माहौल को और भी तीखा बना दिया है। इसी बीच हिमंता का एक पुराना बयान—“आप मेरी मार्कशीट जला सकते हैं”—फिर से चर्चा में आ गया है।
क्या है मार्कशीट वाला बयान?
एक इंटरव्यू में उनके पुराने साथी राहुल महंता ने बताया था कि छात्र जीवन के दौरान हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था कि उन्हें अपनी मार्कशीट की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि उनका लक्ष्य पहले से तय है—राजनीति। जहां आम छात्र अपने करियर और नौकरी को लेकर चिंतित रहते हैं, वहीं हिमंता का फोकस साफ था। उनके लिए मार्कशीट सिर्फ एक औपचारिकता थी, न कि भविष्य का आधार।
शुरू से राजनीति पर फोकस
हिमंता बिस्वा सरमा का राजनीतिक सफर छात्र जीवन से ही शुरू हो गया था। उन्होंने ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) से जुड़कर छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। यही वह दौर था, जिसने उनके राजनीतिक करियर की नींव रखी। उन्होंने धीरे-धीरे खुद को एक मजबूत और प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया।
कांग्रेस से BJP तक का सफर
अपने करियर की शुरुआत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से करने वाले हिमंता बिस्वा सरमा ने पार्टी में तेजी से उभरते हुए कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले।लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेदों के चलते उन्होंने 2015 में कांग्रेस छोड़ दी। इसके बाद वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। यह फैसला असम की राजनीति में बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
बीजेपी में बढ़ता कद
बीजेपी में शामिल होने के बाद हिमंता बिस्वा सरमा ने पूर्वोत्तर में पार्टी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। धीरे-धीरे वे क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने लगे। 1996 में पहली हार के बाद उन्होंने 2001 में वापसी की और तब से लगातार जालुकबारी सीट से जीत दर्ज करते आ रहे हैं।
चुनाव से पहले बढ़ा विवाद
हाल ही में पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री की पत्नी के पास कई पासपोर्ट हैं, जिससे सियासी विवाद खड़ा हो गया। इस मुद्दे ने चुनावी माहौल को और गरमा दिया है। ऐसे समय में हिमंता का पुराना “मार्कशीट” वाला बयान फिर से चर्चा में आना उनके आत्मविश्वास और स्पष्ट लक्ष्य को दिखाता है।
हिमंता बिस्वा सरमा का यह बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और सोच को दर्शाता है। राजनीति में उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो, तो रास्ता खुद बन जाता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि 2026 के चुनाव में यह सियासी घमासान किस दिशा में जाता है।
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