ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। करीब डेढ़ दशक तक सत्ता में रहने के बाद तृणमूल कांग्रेस को बीजेपी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद अब टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी विपक्षी एकता की बात कर रही हैं और INDIA गठबंधन को मजबूत बनाने की अपील कर रही हैं। लेकिन जिन दलों को वह पहले ज्यादा महत्व नहीं देती थीं, वही दल अब उनके साथ आने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। ममता बनर्जी लगातार कह रही हैं कि बीजेपी को हराने के लिए सभी विपक्षी दलों को एकजुट होना होगा। लेकिन कांग्रेस और CPM ने उनके प्रस्ताव को लगभग खारिज कर दिया है। दोनों पार्टियों के नेताओं ने ममता और टीएमसी पर तीखे हमले किए हैं।
CPM ने ममता पर बोला सबसे बड़ा हमला
सीपीएम के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम ने ममता बनर्जी के प्रस्ताव पर बेहद सख्त प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ऐसे किसी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकती, जिसकी पहचान “अपराधी, लुटेरी, भ्रष्ट और सांप्रदायिक” की हो। मोहम्मद सलीम का बयान इस बात का संकेत है कि बंगाल में लेफ्ट फ्रंट अब टीएमसी के साथ किसी भी तरह की राजनीतिक नजदीकी नहीं चाहता। लंबे समय तक पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी और लेफ्ट के बीच संघर्ष चलता रहा है। ऐसे में सत्ता बदलने के बाद भी दोनों के रिश्तों में नरमी आती नहीं दिख रही।
कांग्रेस ने भी दिखाई दूरी
कांग्रेस नेताओं ने भी ममता बनर्जी की अपील पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के प्रवक्ता सौम्या रॉय ने सवाल उठाते हुए कहा कि ममता अब किन दलों को साथ बुला रही हैं? उन्होंने माओवादी हिंसा का जिक्र करते हुए टीएमसी पर निशाना साधा। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद अधीर रंजन चौधरी ने साफ कहा कि अगर ममता बनर्जी राहुल गांधी को INDIA ब्लॉक का नेता मान लें, तभी कांग्रेस उनके प्रस्ताव पर विचार कर सकती है।
अधीर रंजन चौधरी ने यह भी आरोप लगाया कि ममता बनर्जी ने बंगाल में कांग्रेस और सेक्युलर दलों को खत्म करने की पूरी कोशिश की थी। अब जब उनकी राजनीतिक ताकत कमजोर हो गई है, तब उन्हें विपक्षी एकता की याद आ रही है।
आखिर क्यों बदले ममता बनर्जी के सुर?
पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी का राजनीतिक रुख काफी बदला हुआ नजर आ रहा है। पहले वह बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट दलों के साथ गठबंधन करने से बचती थीं। INDIA गठबंधन बनने के बावजूद टीएमसी ने राज्य में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था। अब बीजेपी के सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी विपक्षी दलों से एकजुट होने की अपील कर रही हैं। उन्होंने कहा कि बीजेपी के खिलाफ साझा मंच बनाना जरूरी है और यह “दुश्मन के दुश्मन को दोस्त” समझने का समय नहीं है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल में हार के बाद ममता बनर्जी को महसूस हो रहा है कि अकेले बीजेपी का मुकाबला करना आसान नहीं होगा। इसलिए वह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों को फिर से एक मंच पर लाने की कोशिश कर रही हैं।
बंगाल में बदल रहा राजनीतिक माहौल
बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति पूरी तरह बदलती नजर आ रही है। टीएमसी, जो कभी बंगाल की सबसे ताकतवर पार्टी मानी जाती थी, अब विपक्ष की भूमिका में आ गई है। बताया जा रहा है कि टीएमसी सरकार के समय जिन कांग्रेस और लेफ्ट कार्यालयों पर कथित कब्जे के आरोप लगते रहे, वहां अब दोबारा पुराने दलों के कार्यकर्ता लौटने लगे हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि बंगाल में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।
INDIA गठबंधन का भविष्य क्या?
ममता बनर्जी की अपील के बावजूद फिलहाल कांग्रेस और CPM का रुख काफी सख्त दिखाई दे रहा है। विपक्षी दलों के बीच भरोसे की कमी साफ नजर आ रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या INDIA गठबंधन दोबारा मजबूत हो पाएगा या फिर विपक्षी राजनीति अलग-अलग रास्तों पर आगे बढ़ेगी। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों को साथ आना जरूरी है। लेकिन बंगाल की राजनीति में पिछले कई वर्षों की कड़वाहट इतनी आसानी से खत्म होती नहीं दिख रही।
फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी विपक्षी दलों का भरोसा दोबारा जीत पाएंगी या फिर टीएमसी को अकेले ही अपनी राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ेगी।
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