ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एक ऐसा मामला पहुंचा, जिसने कानूनी और राजनीतिक हलकों में अचानक चर्चा बढ़ा दी। याचिका में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम के एक गैर-पंजीकृत संगठन पर कथित राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। साथ ही यह भी कहा गया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए युवाओं को भड़काने की कोशिश की जा रही है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि इस पूरे मामले की जांच राष्ट्रीय स्तर की एजेंसियों से कराई जाए। आरोप यह भी था कि संगठन को विदेशी फंडिंग मिल रही है और उससे देशविरोधी माहौल बनाने की कोशिश हो सकती है। याचिका में फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सऐप, टेलीग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स पर चल रहे कुछ खातों को ब्लॉक करने की मांग भी रखी गई।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सबसे पहले क्षेत्राधिकार यानी jurisdiction का सवाल उठाया। कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ता ने खुद को बेंगलुरु का स्थायी निवासी बताया है। अदालत की तरफ से यह टिप्पणी आई कि अगर मामला राष्ट्रीय महत्व का है और याचिकाकर्ता कर्नाटक से है, तो पहले वहां के सक्षम न्यायालय का रुख किया जाना चाहिए था।
यही नहीं, अदालत ने यह भी साफ किया कि याचिका में उत्तर प्रदेश से जुड़ा ऐसा कोई ठोस कारण नहीं बताया गया, जिसके आधार पर लखनऊ बेंच इस मामले की सुनवाई करे। इस टिप्पणी के बाद मामला कानूनी रूप से कमजोर पड़ता दिखा और याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी।
अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी और कहा कि याचिकाकर्ता चाहे तो उचित अदालत में नई याचिका दायर कर सकता है। यानी कोर्ट ने आरोपों के सही या गलत होने पर कोई फैसला नहीं दिया, बल्कि सिर्फ यह कहा कि यह मामला इस बेंच के सामने सुनवाई योग्य नहीं है।
यहां एक अहम बात समझने वाली है कि किसी भी बड़े आरोप वाले मामले में अदालत पहले यह देखती है कि क्या वह अदालत उस मामले को सुनने का अधिकार रखती है या नहीं। अगर jurisdiction ही साफ न हो, तो मामला आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। यही इस केस में भी हुआ।
यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि सोशल मीडिया अब सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि कानूनी विवादों का बड़ा क्षेत्र बन चुका है। यदि किसी संगठन, समूह या डिजिटल नेटवर्क पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो जांच एजेंसियों और अदालतों के सामने यह चुनौती रहती है कि तथ्यों, दायरे और अधिकार क्षेत्र को साफ तरीके से तय किया जाए।
आने वाले समय में यह मामला किसी दूसरी अदालत में फिर से उठ सकता है। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि लखनऊ बेंच ने इस पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। ऐसे मामलों में सिर्फ आरोप काफी नहीं होते, कानूनी प्रक्रिया और सही मंच का चुनाव भी उतना ही जरूरी होता है।
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