भागवत के सावरकर-भारत रत्न बयान पर चंद्रशेखर आज़ाद का तंज: “मना कौन करेगा?”
नगीना सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने मोहन भागवत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा—कोई भी पुरस्कार की मांग कर सकता है, लेकिन “स्थिति अलग” है; साथ ही कांशीराम और कोतवाल धन सिंह गुर्जर को भारत रत्न देने की मांग दोहराई।
भागवत के सावरकर-भारत रत्न बयान पर चंद्रशेखर आज़ाद का तंज: “मना कौन करेगा?”
  • Category: उत्तर प्रदेश

देश में भारत रत्न को लेकर बहसें पहले भी होती रही हैं, लेकिन जब बड़े पदों पर बैठे लोग किसी नाम का समर्थन करते हैं तो चर्चा और तेज हो जाती है। इस बार मुद्दा वीर सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की मांग/बयान को लेकर सामने आया है।

इसी पर उत्तर प्रदेश की नगीना लोकसभा सीट से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने खुलकर प्रतिक्रिया दी और अपनी बात सीधे, रोज़मर्रा की भाषा में रखी।
उनकी प्रतिक्रिया के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक यह सवाल फिर उठने लगा कि “किसे सम्मान मिले, और किस आधार पर?”

भारत रत्न देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है, इसलिए इससे जुड़ा हर बयान सिर्फ सम्मान की बात नहीं रहता, वह इतिहास, राजनीति और समाज—तीनों को छू जाता है।
ऐसे मामलों में एक पक्ष इसे “योग्यता और योगदान” से जोड़कर देखता है, तो दूसरा पक्ष “पसंद-नापसंद” और “सियासी एजेंडा” की नजर से।
इसलिए किसी एक नाम पर चर्चा शुरू होते ही कई दूसरे नाम भी सामने आने लगते हैं, जो वर्षों से अपने समर्थकों की तरफ से सम्मान की मांग कर रहे होते हैं।


चंद्रशेखर आज़ाद ने क्या कहा

नगीना सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी है और कोई भी किसी के लिए पुरस्कार की मांग कर सकता है।
लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की स्थिति अलग है।
चंद्रशेखर आज़ाद ने तंज कसते हुए कहा कि भागवत “सरकार के मालिक जैसे हैं”, वे कह देंगे तो “भला कौन मना करेगा।”

इस बयान के जरिए उन्होंने एक बात साफ संकेत में कही—जब प्रभावशाली लोग किसी सम्मान की मांग करते हैं, तो उस मांग का वजन आम लोगों की मांग से अलग हो जाता है।
कई बार किसी सम्मान पर फैसला एक लंबी प्रक्रिया, बहस और मूल्यांकन के बाद होना चाहिए, लेकिन दबदबा और राजनीतिक माहौल उसे तेज भी कर देता है।
यही कारण है कि इस तरह के बयान आते ही “प्रक्रिया” और “निष्पक्षता” पर सवाल खड़े होने लगते हैं।


इतिहास में दर्ज है”—योगदान का तर्क

चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि आज़ादी और सामाजिक बदलाव की लड़ाई में किसका कितना योगदान रहा है, यह इतिहास में दर्ज है और किसी से छिपा नहीं है।
उनका मतलब यह था कि किसी व्यक्ति का आकलन भावनाओं से नहीं, उसके काम और ऐतिहासिक रिकॉर्ड से होना चाहिए।
यह लाइन सुनने में सामान्य लगती है, लेकिन राजनीति में इसका अर्थ बड़ा होता है, क्योंकि हर दल “योगदान” की परिभाषा अपने हिसाब से आगे रखता है।

हकीकत यह है कि देश की आज़ादी की लड़ाई और सामाजिक आंदोलनों का इतिहास बहुत बड़ा है।
एक ही घटना को अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है, और उसी से “नायक” और “विरोधी” की पहचान बनती है।
ऐसे में जब भारत रत्न जैसे सम्मान की बात आती है, तो बहस सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती—वह विचार और पहचान की लड़ाई भी बन जाती है।


कांशीराम के लिए भारत रत्न की मांग

चंद्रशेखर आज़ाद ने दोहराया कि उनकी पार्टी लंबे समय से बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम को भारत रत्न दिए जाने की मांग कर रही है।
उन्होंने कहा कि कांशीराम ने देश की राजनीति और सामाजिक चेतना को नई दिशा दी और वंचित समाज को संगठित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
यह मांग कोई नई नहीं है, लेकिन इस बार उन्होंने इसे फिर इसलिए उठाया क्योंकि एक बार फिर भारत रत्न का मुद्दा चर्चा में है।

कई लोगों के लिए कांशीराम का योगदान सिर्फ राजनीति तक नहीं था; वह समाज के उन वर्गों तक आवाज पहुंचाने का तरीका था, जो लंबे समय तक हाशिए पर रहे।
इसी वजह से उनके समर्थक मानते हैं कि उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा जाना चाहिए।
जब भी किसी और नाम का प्रस्ताव आता है, उनके समर्थक अपने नेता का नाम याद दिलाते हैं, ताकि बहस “सिर्फ एक नाम” पर टिककर न रह जाए।


कोतवाल धन सिंह गुर्जर का नाम भी सामने

नगीना सांसद ने 1857 की क्रांति के नायक कोतवाल धन सिंह गुर्जर को भी भारत रत्न देने की मांग दोहराई।
उन्होंने कहा कि ऐसे वीरों और महापुरुषों को उचित सम्मान न देकर सरकार उन वर्गों का अपमान कर रही है, जिनसे ये महापुरुष जुड़े रहे।
उनके बयान में यह बात भी थी कि सम्मान सिर्फ व्यक्ति का नहीं होता, उससे जुड़े समाज और समुदाय की भावना भी जुड़ी होती है।

यही कारण है कि कई बार सम्मान की मांग “प्रतिनिधित्व” की मांग बन जाती है।
लोग यह महसूस करते हैं कि जिनके संघर्ष और योगदान से समाज आगे बढ़ा, अगर उनका नाम सरकारी सम्मान की सूची में नहीं आएगा तो यह अनदेखी जैसी लगेगी।
इसका असर चुनावी राजनीति और सामाजिक रिश्तों—दोनों पर पड़ सकता है।


चेतावनी वाला संदेश: “वोट की ताकत”

चंद्रशेखर आज़ाद ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि समाज इस उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं करेगा।
उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने इन महान हस्तियों को सम्मान देने की मांग पर ध्यान नहीं दिया तो जनता लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देगी।
उन्होंने यह भी कहा कि “हमारे लोग यह अपमान सहन नहीं करेंगे और वोट की ताकत से इसका बदला लेंगे।”

यहां उनका इशारा साफ है—सम्मान और पहचान के मुद्दे अब चुनावी बहस का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
राजनीति में अक्सर विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे सबसे आगे रहते हैं, लेकिन सम्मान और प्रतीक (symbols) भी लोगों को उतना ही जोड़ते-तोड़ते हैं।
और जब कोई नेता “वोट की ताकत” की बात करता है, तो संदेश यही होता है कि यह मुद्दा सिर्फ भाषण तक सीमित नहीं रहेगा।


अब आगे क्या?

इस पूरे घटनाक्रम के बाद दो तरह की चर्चाएं तेज होंगी। पहली, क्या भारत रत्न जैसे सम्मान के लिए कोई स्पष्ट और पारदर्शी मानक लोगों के सामने आना चाहिए?
दूसरी, क्या अलग-अलग समाजों और आंदोलनों के नायकों को सम्मान देने में संतुलन बनाया जा सकता है, ताकि किसी को लगे नहीं कि उसे जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है?

आगे यह भी देखना होगा कि सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है और क्या अन्य दल भी अपने-अपने “दावेदार” नामों को लेकर मैदान में आते हैं।
क्योंकि जैसे ही एक नाम पर बहस शुरू होती है, वैसे ही कई दूसरे नाम भी चर्चा में आने लगते हैं—और तब भारत रत्न का सवाल, असल में “देश किस तरह का इतिहास याद रखना चाहता है” वाले सवाल में बदल जाता है।

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