ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
जापान को हम अक्सर एक आधुनिक देश मानते हैं—जहां बुलेट ट्रेन है, नई टेक्नोलॉजी है और दुनिया भर में पॉप कल्चर का असर भी दिखता है। लेकिन इसी चमक-दमक के पीछे एक पुराना नियम भी चलता आ रहा है, जो जापान के शाही सिंहासन तक महिलाओं की पहुंच रोक देता है। आसान भाषा में कहें तो वहां एक ऐसी “राजकुर्सी” है, जिस पर आज के कानून के हिसाब से कोई लड़की/महिला सम्राट बनकर नहीं बैठ सकती।
यह बात सुनकर बहुत लोगों को हैरानी होती है, क्योंकि जापान में शाही परिवार में महिलाएं मौजूद हैं और उन्हें सम्मान भी मिलता है। फिर सवाल उठता है—जब महिलाएं शाही परिवार में हैं, तो वे शासक क्यों नहीं बन सकतीं?
शाही परिवार में महिलाएं, लेकिन सिंहासन दूर
जापान की मौजूदा महारानी का नाम महारानी मासाको है और उन्हें देश-विदेश में सम्मान के साथ देखा जाता है। उनकी शादी जापान के मौजूदा सम्राट, सम्राट नारुहितो से हुई है। यानी शाही परिवार के सबसे ऊंचे स्तर पर महिला की मौजूदगी है, फिर भी कानून उन्हें “सम्राट” की कुर्सी तक नहीं पहुंचने देता।
यहां एक बात समझना जरूरी है—कई लोग “महारानी” शब्द सुनकर मान लेते हैं कि वही शासन करती होंगी। लेकिन जापान के नियमों में “महारानी” का मतलब और उसकी भूमिका अलग तरह से समझी जाती है।
कानून क्या कहता है: उत्तराधिकारी सिर्फ पुरुष
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1947 में जापान का शाही परिवार कानून लागू किया गया था। इसी कानून में साफ तौर पर कहा गया है कि पिता की तरफ से सिर्फ पुरुष वंशज ही सिंहासन के उत्तराधिकारी बन सकते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अगर सम्राट की पहली संतान बेटी है, तब भी वह उत्तराधिकारी नहीं मानी जाएगी।
इसी नियम के कारण सम्राट नारुहितो की इकलौती बेटी, राजकुमारी आइको, भविष्य में सम्राट नहीं बन सकतीं। कानून में एक और अहम बात भी है—शाही परिवार की कोई महिला सदस्य शादी करने के बाद अपना शाही दर्जा खो देती है और आम नागरिक बन जाती है। यानी महिला का शाही परिवार में बने रहना भी कई मामलों में सीमित हो जाता है।
“महारानी” के दो मतलब: यहां भ्रम होता है
जापान में “महारानी” शब्द के दो अलग-अलग मतलब बताए जाते हैं। पहला मतलब है “महारानी पत्नी”—यानी सम्राट की पत्नी, जो एक मानद और औपचारिक भूमिका निभाती हैं। यही भूमिका आज महारानी मासाको निभा रही हैं, और इस पद में राजनीतिक अधिकार नहीं होते।
दूसरा मतलब है “शासक महारानी”—यानी ऐसी महिला जो अपने अधिकार से शासन करे और सिंहासन पर बैठे। मौजूदा कानून के तहत यह भूमिका कानूनी रूप से संभव नहीं है। इसी वजह से कहा जाता है कि “लड़की उस कुर्सी पर नहीं बैठ सकती”, क्योंकि कुर्सी का मतलब यहां शासन की सर्वोच्च औपचारिक कुर्सी से है।
आज के जापान में सम्राट की भूमिका क्या है
रिपोर्ट के मुताबिक आधुनिक जापान में सम्राट खुद प्रतीकात्मक व्यक्ति हैं। असली राजनीतिक शक्ति प्रधानमंत्री और चुनी हुई सरकार के पास होती है। फिर भी शाही परंपरा, पहचान और देश की ऐतिहासिक निरंतरता में सम्राट का पद बहुत अहम माना जाता है।
यही कारण है कि उत्तराधिकार का नियम सिर्फ एक “परिवार का नियम” नहीं लगता, बल्कि वह देश की परंपरा और पहचान से भी जुड़ जाता है। इसलिए जब भी इस नियम पर चर्चा होती है, तो बात भावनाओं तक पहुंच जाती है।
इतिहास में तो महिलाएं भी राज कर चुकी हैं
दिलचस्प बात यह है कि जापान का इतिहास आज के नियमों से बिल्कुल उलटी तस्वीर भी दिखाता है। पुराने समय में महिलाओं को राज करने की इजाजत थी और जापान में आठ महारानी हुई हैं, जिन्होंने कुल 10 बार शासन किया है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन महिलाओं में से ज्यादातर संकट के समय गद्दी पर बैठीं।
ऐसा तब हुआ जब कोई बालिग पुरुष वारिस नहीं था या जब वारिस राज करने के लिए बहुत छोटा था। उनके राज को अक्सर अस्थायी माना गया और बाद में सत्ता वापस एक पुरुष उत्तराधिकारी के पास चली जाती थी। यानी महिला शासक का होना “संभव” तो था, लेकिन उसे स्थायी व्यवस्था का हिस्सा कम ही माना गया।
नियम कैसे बदला: 19वीं सदी का असर
रिपोर्ट के अनुसार 19वीं सदी के मेईजी युग में जापान ने पश्चिमी प्रभाव में अपने कई कानूनों को फिर से बनाया। उसी दौर में 1889 में एक नए कानूनी ढांचे ने उत्तराधिकार का नियम सिर्फ पुरुषों के लिए तय किया। बाद में 1947 के शाही परिवार कानून में इस नियम को फिर से मजबूत किया गया।
यहीं से आज वाली स्थिति बनी—जहां शाही परिवार की महिलाएं सम्मानित तो हैं, लेकिन सिंहासन की दौड़ से बाहर हैं। और इसी वजह से “वह कुर्सी” एक परंपरा और कानून—दोनों का प्रतीक बन जाती है।
आम लोगों के मन में उठता सवाल
बहुत लोगों को यह बात आज के दौर में अजीब लगती है कि आधुनिकता के लिए मशहूर देश में इतना पुराना नियम अब भी क्यों चल रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक बाहर से जापान प्रगतिशील दिखता है, लेकिन शाही उत्तराधिकार का नियम सदियों पुरानी सोच से जुड़ा हुआ है। इसी टकराव की वजह से यह विषय बार-बार चर्चा में आता है।
फिलहाल, जापान में शाही सिंहासन का उत्तराधिकार कानून के हिसाब से पुरुष वंशज तक ही सीमित है, और इसी वजह से किसी लड़की का उस “राजकुर्सी” पर बैठना संभव नहीं माना जाता।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!