सीएम योगी की सुरक्षा पर सालाना कितना खर्च होता है? Z+ कवर, खर्च और जिम्मेदारी की पूरी बात
सीएम योगी आदित्यनाथ को Z+ सुरक्षा मिली है, जिसमें कमांडो, बुलेटप्रूफ गाड़ी, जैमर और 24×7 टीम शामिल रहती है। रिपोर्टों के अनुमान के मुताबिक उनकी सुरक्षा पर सालाना 25–30 करोड़ रुपये तक खर्च माना जाता है। जानिए यह खर्च राज्य उठाता है या केंद्र।
सीएम योगी की सुरक्षा पर सालाना कितना खर्च होता है? Z+ कवर, खर्च और जिम्मेदारी की पूरी बात
  • Category: उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश की राजनीति जितनी तेज़ और चर्चा में रहती है, उतनी ही संवेदनशील यहां की सुरक्षा व्यवस्था भी मानी जाती है। खासकर जब बात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सुरक्षा की आती है, तो लोगों के मन में एक सवाल बहुत आम है—इतनी कड़ी सुरक्षा पर आखिर खर्च कितना होता है, और यह पैसा आता कहां से है? कई बार रोड पर लंबा काफिला, चारों तरफ कमांडो, बुलेटप्रूफ गाड़ियां और सख्त घेरा देखकर यही जिज्ञासा बढ़ती है कि यह व्यवस्था किस नियम के तहत चलती है।

इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए तीन बातों को अलग-अलग देखना जरूरी है—पहली, सीएम को किस तरह की सुरक्षा श्रेणी मिली है। दूसरी, उस सुरक्षा में क्या-क्या चीजें शामिल होती हैं। और तीसरी, खर्च उठाने की जिम्मेदारी आखिर केंद्र की है या राज्य की।

सीएम योगी की सुरक्षा श्रेणी क्या है?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उन चुनिंदा नेताओं में शामिल बताए जाते हैं, जिन्हें Z+ श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है। Z+ सुरक्षा का मतलब आम तौर पर सबसे कड़े सुरक्षा घेरे में से एक माना जाता है, जिसमें हर मूवमेंट को लेकर सुरक्षा प्लानिंग काफी हाई लेवल पर होती है।

वर्तमान व्यवस्था के तहत उनकी सुरक्षा में प्रशिक्षित कमांडो, आधुनिक हथियार, बुलेटप्रूफ वाहन, जैमर सिस्टम और 24×7 क्लोज प्रोटेक्शन टीम की तैनाती जैसी बातें शामिल बताई गई हैं। सुरक्षा का यह स्तर यूं ही तय नहीं होता, बल्कि खुफिया एजेंसियां समय-समय पर खतरे का आकलन करती हैं और उसी आधार पर सुरक्षा बढ़ाई या घटाई जाती है।

सुरक्षा में क्या-क्या शामिल होता है?

जब लोग “सुरक्षा” सुनते हैं, तो अक्सर उन्हें सिर्फ गनमैन या काफिला याद आता है। लेकिन असल में सुरक्षा एक पूरा सिस्टम होता है। इसमें कई लेयर होती हैं—करीबी सुरक्षा टीम, रूट सुरक्षा, वेन्यू की जांच, टेक्निकल सपोर्ट और लगातार अलर्ट मोड।

रिपोर्ट के मुताबिक इस सुरक्षा में:

Ø  प्रशिक्षित कमांडो और क्लोज प्रोटेक्शन टीम 24×7 तैनात रहती है।

Ø  बुलेटप्रूफ वाहन इस्तेमाल में आते हैं।

Ø  जैमर सिस्टम जैसी टेक्नोलॉजी भी शामिल रहती है।

Ø  साथ में हथियार, लॉजिस्टिक सपोर्ट, वाहन, ईंधन और दूसरी तकनीकी जरूरतें भी आती हैं।

यानी यह सिर्फ “एक आदमी की सुरक्षा” नहीं, बल्कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की सुरक्षा है, जो सीधे तौर पर राज्य की स्थिरता और प्रशासन से जुड़ जाती है।

सालाना खर्च कितना माना जाता है?

सबसे बड़ा सवाल—खर्च कितना? रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी बजट दस्तावेजों और अलग-अलग RTI से सामने आए अनुमानों के मुताबिक मुख्यमंत्री योगी की सुरक्षा पर सालाना खर्च करीब 25 से 30 करोड़ रुपये के बीच माना जाता है। इस खर्च में कई मदें शामिल रहती हैं, जैसे:

Ø  सुरक्षाकर्मियों का वेतन।

Ø  ट्रेनिंग।

Ø  हथियार और उपकरण।

Ø  वाहन और ईंधन।

Ø  लॉजिस्टिक सपोर्ट और तकनीकी उपकरण।

हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि सरकार आम तौर पर किसी एक व्यक्ति की सुरक्षा लागत का अलग से बहुत डिटेल सार्वजनिक ब्योरा जारी नहीं करती। इसलिए जो आंकड़े सामने आते हैं, वे अक्सर “अनुमान” या दस्तावेजों/सूचनाओं पर आधारित बताए जाते हैं।

खर्च उठाता कौन है—केंद्र या राज्य?

यह हिस्सा लोगों को सबसे ज्यादा कन्फ्यूज करता है, क्योंकि सुरक्षा में कई बार केंद्रीय बलों की चर्चा भी होती है। रिपोर्ट के अनुसार संवैधानिक व्यवस्था में किसी राज्य के मुख्यमंत्री की सुरक्षा का प्राथमिक दायित्व राज्य सरकार का होता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर सुरक्षा में केंद्रीय बल (जैसे NSG या CRPF) की तैनाती होती है, तब भी उस तैनाती का खर्च संबंधित राज्य सरकार ही केंद्र को वहन करती है। मतलब बल भले ही केंद्रीय हों, लेकिन भुगतान राज्य के खजाने से किया जाता है। इसी आधार पर यह बताया गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार सीएम योगी की सुरक्षा से जुड़ा अधिकांश खर्च खुद उठाती है।

इतनी कड़ी सुरक्षा क्यों जरूरी मानी जाती है?

रिपोर्ट के मुताबिक सीएम योगी का नाम उन नेताओं में आता है जिन्हें अलग-अलग कारणों से लगातार धमकियां मिलती रही हैं। उनकी राजनीतिक भूमिका, प्रशासनिक फैसले और सार्वजनिक गतिविधियों को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियां उन्हें “उच्च जोखिम” की श्रेणी में मानती हैं, इसलिए सुरक्षा में ढील नहीं बरती जाती। जरूरत पड़ने पर व्यवस्था को और मजबूत करने की बात भी कही गई है।

यह भी समझना जरूरी है कि मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति की सुरक्षा में चूक का असर सिर्फ व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इससे प्रशासन, कानून-व्यवस्था और राज्य के कामकाज पर भी असर पड़ सकता है।

सुरक्षा खर्च को कैसे देखें?

रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से यह बात सामने आती है कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की सुरक्षा को केवल “खर्च” के नजरिये से नहीं देखना चाहिए। यह व्यक्ति की सुरक्षा के साथ-साथ राज्य की प्रशासनिक स्थिरता और कानून-व्यवस्था से भी जुड़ा विषय है। इसी वजह से सरकारें सुरक्षा पर होने वाले खर्च को जरूरी मानती हैं।

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