ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज हो गई है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी (सपा) ने दलित समुदाय को साधने के लिए बड़ा कदम उठाया है। पार्टी ने ऐलान किया है कि इस बार कांशीराम की जयंती को ‘पीडीए दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। इस फैसले को आगामी चुनावों की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
कांशीराम जयंती पर ‘पीडीए दिवस’ मनाने की तैयारी
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी के सभी पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को पत्र लिखकर निर्देश दिए हैं कि 15 मार्च को कांशीराम जयंती के अवसर पर हर जिले में कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। इन कार्यक्रमों में ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को एकजुट करने पर जोर रहेगा।
पार्टी का मानना है कि कांशीराम ने सामाजिक न्याय की राजनीति को मजबूत किया और बहुजन समाज को एक मंच पर लाने का काम किया। सपा इसी विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश देना चाहती है।
मंडल आंदोलन और 1993 का गठबंधन
पत्र में यह भी याद दिलाया गया है कि कांशीराम ने मंडल आयोग की सिफारिशों के समर्थन में देशव्यापी आंदोलन खड़ा किया था। इतना ही नहीं, साल 1993 में उन्होंने सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के साथ समझौता कर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी।
उस समय ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ का नारा काफी चर्चित हुआ था। इस गठबंधन को सामाजिक समीकरणों की बड़ी मिसाल माना जाता है। सपा अब उसी इतिहास को दोहराने की कोशिश करती नजर आ रही है।
हर जिले में कार्यक्रम और श्रद्धांजलि सभा
सपा की योजना है कि कांशीराम जयंती पर प्रदेश के सभी जिलों में श्रद्धांजलि सभाएं और सामाजिक न्याय से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। इन आयोजनों के जरिए पार्टी पीडीए वर्ग, खासकर दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।
बीते कुछ वर्षों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का प्रभाव कम होता दिखा है। ऐसे में सपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह ही दलितों और पिछड़ों की असली हितैषी है।
दलित वोटरों पर सपा की खास नजर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। अगर दलित और ओबीसी वोट एकजुट हो जाएं, तो चुनावी नतीजे पूरी तरह बदल सकते हैं। यही वजह है कि सपा लगातार सामाजिक न्याय और पीडीए की राजनीति को केंद्र में रखकर रणनीति बना रही है।
2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने ‘पीडीए’ का नारा दिया था, जिसका असर भी देखने को मिला। बड़ी संख्या में ओबीसी और दलित वोटर्स ने सपा का समर्थन किया और पार्टी 37 सीटें जीतकर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनी।
2027 के लिए सियासी संदेश
स्पष्ट है कि सपा 2027 के विधानसभा चुनाव में भी पीडीए फॉर्मूले को ही आगे बढ़ाने जा रही है। कांशीराम जयंती को ‘पीडीए दिवस’ के रूप में मनाना सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक संदेश है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि सपा की यह रणनीति दलित वोटरों को कितना प्रभावित कर पाती है और क्या 1993 जैसा सामाजिक समीकरण एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया अध्याय लिख पाएगा।
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