ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
मध्य पूर्व में जब भी तनाव बढ़ता है, दुनिया की नजर हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर टिक जाती है. इस बार भी ऐसा ही हो रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने इस समुद्री रास्ते को फिर वैश्विक संकट का केंद्र बना दिया है.
कारण साफ है, दुनिया के समुद्री तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए यहां जरा-सी रुकावट भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों, तेल कीमतों और समुद्री सुरक्षा पर सीधा असर डाल सकती है.
रिपोर्टों
के मुताबिक ईरान लंबे समय से हॉर्मुज को अपने रणनीतिक दबाव के औजार की तरह देखता
रहा है, लेकिन मौजूदा हालात में
इसका महत्व और बढ़ गया है.
कुछ विश्लेषणों में इसे ईरान का “आर्थिक परमाणु हथियार” तक कहा गया
है, क्योंकि बिना मिसाइल दागे भी यह दुनिया की अर्थव्यवस्था
पर असर डाल सकता है.
ईरान का प्रस्ताव क्या था
उपलब्ध
रिपोर्टों के अनुसार ईरान की ओर से एक ऐसा प्रस्ताव सामने आया, जिसमें पहले युद्ध रोकने
और हॉर्मुज को खोलने की बात थी, जबकि परमाणु कार्यक्रम पर
बातचीत बाद में करने का संकेत दिया गया.
यानी तेहरान चाहता था कि फिलहाल सैन्य तनाव कम किया जाए और बाद में
परमाणु विवाद पर अलग से बात हो.
लेकिन
ट्रंप प्रशासन इस तरह की व्यवस्था से संतुष्ट नहीं दिखा. रिपोर्ट में कहा गया है कि
ट्रंप इस बात से नाराज थे कि प्रस्ताव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर तत्काल और
साफ प्रतिबद्धता नहीं थी.
अमेरिकी रुख यही बताया गया कि किसी भी समझौते का केंद्र यह होना
चाहिए कि ईरान परमाणु हथियार की दिशा में आगे न बढ़े.
दुनिया क्यों चिंतित है
इस पूरे
विवाद की चिंता सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है. हॉर्मुज में किसी भी तरह
की नाकाबंदी, सैन्य
मुठभेड़ या जहाजरानी बाधा का असर एशिया, यूरोप और खाड़ी
देशों तक जाएगा.
रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ने से
पहले ही शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर वैश्विक चिंता बढ़ चुकी है.
यही वजह
है कि कूटनीतिक प्रयास भी साथ-साथ चल रहे हैं. एक तरफ दबाव और सैन्य तैयारियों की
खबरें हैं, दूसरी
तरफ पर्दे के पीछे बातचीत की कोशिशें भी जारी हैं.
फिलहाल स्थिति यह है कि कोई भी पक्ष खुलकर पीछे हटता नहीं दिख रहा,
लेकिन सीधी टक्कर के नतीजों को लेकर सब सतर्क हैं.
रिपोर्टों
में यह बात उभरकर सामने आई कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील
बिंदु बन चुका है.
ट्रंप प्रशासन की ओर से संकेत मिला है कि परमाणु मुद्दे को अलग रखकर
किसी अस्थायी युद्धविराम व्यवस्था पर सहमति आसान नहीं होगी.
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