'रत्ती भर भी नहीं…' - ये लाइन कहां से निकली, जानिए इस अनोखे बीज की कहानी…
‘रत्ती भर भी शर्म नहीं’, ये कहावत सिर्फ कहने की बात नहीं है। जानिए, रत्ती असल में क्या होता है, कैसे सोना तौलने में इसका इस्तेमाल होता था और जंगलों में मिलने वाले इस बीज की क्या है दिलचस्प कहानी।
'रत्ती भर भी नहीं…' - ये लाइन कहां से निकली, जानिए इस अनोखे बीज की कहानी…
  • Category: सामान्य ज्ञान

हम सबने कभी न कभी ये शब्द जरूर सुना होगा, "रत्ती भर भी शर्म नहीं", "रत्ती भर भी प्यार नहीं बचा", "रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा", लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि ये 'रत्ती भर' आख़िर आया कहां से?


ये कोई मनगढंत माप नहीं, बल्कि असल में एक बीज से निकला शब्द है, जिसे सदियों पहले सोने की तौल में इस्तेमाल किया जाता था।


रत्ती क्या होता है?


रत्ती असल में जंगल में पाए जाने वाले एक पौधे गुंजा (Abrus precatorius) के बीजों का नाम है। इन बीजों की खास बात ये होती है कि इनका वजन लगभग बराबर होता है, इतना सटीक कि पुराने समय के सोनार इन्हीं दानों से सोना तौला करते थे।


यानी "एक रत्ती", "दो रत्ती", "चार रत्ती" जैसे पैमाने, जो आज भी पुराने ज़ेवरों की दुकानों में सुनने को मिलते हैं।


गुंजा बीज से रत्ती कैसे बना?


गुंजा के बीज छोटे, गोल, बेहद सुंदर और आमतौर पर लाल रंग के होते हैं, जिन पर एक काला या सफेद धब्बा होता है।


इन बीजों का वजन करीब 0.1215 ग्राम होता है और खास बात ये है कि एक-दूसरे से इनके वजन में अंतर नगण्य होता है। इसी सटीकता ने इन्हें वजन का माप बना दिया।


तब ना इलेक्ट्रॉनिक तराजू थे, ना डिजिटल स्केल। सोनार या वैद्य जब किसी चीज़ को बेहद बारीकी से तौलना चाहते, तो वो इन रत्तियों का सहारा लेते।


कहां-कहां मिलती हैं रत्तियां?


आज भी छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही ज़िले के जंगलों में ये रत्ती के बीज, लाल, काले और कभी-कभी सफेद रंग में पाए जाते हैं। सफेद रत्ती सबसे दुर्लभ मानी जाती है।


स्थानीय आदिवासी समुदाय इन्हें 'गेमची' या 'बेमची' भी कहते हैं और इन्हें सांस्कृतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण मानते हैं।


क्या होता है रत्ती का सांस्कृतिक इस्तेमाल?


गांव-देहातों में आज भी शादी-ब्याह में लड़के और लड़की के हाथ में रत्ती बांधने की परंपरा है। खास मौकों जैसे कनकन मौक्ष या तीज-त्यौहार पर ये बीज प्रयोग में लाए जाते हैं।


सफेद रत्ती का इस्तेमाल बच्चों और महिलाओं को ठंड से बचाने में होता है, उन्हें गले में लटकाकर पहनाया जाता है, जिससे कहा जाता है कि शरीर में गर्मी बनी रहती है।


आभूषण में भी है रत्ती की शोभा


सिर्फ तौल में ही नहीं, रत्ती की सुंदरता ने इसे आभूषण का हिस्सा भी बना दिया। कई आदिवासी समुदाय इन बीजों से गहने बनाते हैं, हार, चूड़ियां, झुमके।


ये एक तरह का नेचुरल फैशन है, जो न सिर्फ दिखने में आकर्षक होता है बल्कि परंपरा से भी जुड़ा होता है।


मुहावरे में कैसे आया 'रत्ती भर'?


अब बात करते हैं भाषा की। जब कोई चीज़ बहुत छोटी हो, बहुत कम हो, तो लोग कहने लगे, “रत्ती भर भी नहीं।” मतलब, इतना भी नहीं जितना एक रत्ती का वजन होता है।


ऐसे ही ये शब्द भाषा में घुस गया और अब 'रत्ती भर' सिर्फ सोने की नहीं, इंसानों की भावनाओं और बर्ताव की माप बन चुका है।


तो अगली बार जब कोई कहे ‘मुझे रत्ती भर भी परवाह नहीं’, तो समझ जाइए, वो वाकई बहुत थोड़ा कह रहा है, लेकिन उसका मोल बहुत गहरा है।


आप क्या सोचते हैं इस खबर को लेकर, अपनी राय हमें नीचे कमेंट्स में जरूर बताएँ।

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