ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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“थर्ड वर्ल्ड” या तीसरी दुनिया एक ऐसा शब्द है जिसे अक्सर गरीबी, पिछड़ापन और विकास की कमी से जोड़ा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका जन्म किसी आर्थिक संकट से नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और कूटनीतिक परिस्थिति से हुआ था?
शीत युद्ध की कोख से जन्मा थर्ड वर्ल्ड
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व दो बड़े गुटों में बंट गया था। एक तरफ अमेरिका के नेतृत्व वाला पूंजीवादी ब्लॉक था, जिसे प्रथम विश्व कहा गया। दूसरी तरफ सोवियत संघ के नेतृत्व वाला साम्यवादी ब्लॉक था, जिसे द्वितीय विश्व कहा गया। इन दोनों महाशक्तियों के बीच की लड़ाई को शीत युद्ध कहा गया।
उस समय कई देश न तो अमेरिका के पाले में थे और न ही सोवियत संघ के साथ। ऐसे देशों को तीसरी दुनिया या थर्ड वर्ल्ड कहा जाने लगा। ये देश स्वतंत्र थे, लेकिन वैश्विक राजनीति में किसी महाशक्ति के प्रभाव में नहीं थे।
थर्ड वर्ल्ड शब्द का आविष्कार
थर्ड वर्ल्ड शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1952 में फ्रांसीसी अर्थशास्त्री और जनसांख्यिकी विशेषज्ञ अल्फ्रेड सॉवी ने किया था। उन्होंने इसे फ्रांसीसी क्रांति के तीसरे एस्टेट से तुलना करते हुए इस्तेमाल किया। जैसा कि क्रांति से पहले आम जनता (किसान, मजदूर) पादरियों और कुलीनों के दबाव में थी, उसी तरह ये देश भी वैश्विक राजनीति में नजरअंदाज थे। सॉवी ने इसे अपमानजनक नहीं, बल्कि एक उभरती शक्ति के रूप में देखा।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन और भारत
तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, मिस्र के नासिर और युगोस्लाविया के टीटो ने मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की नींव रखी। भारत इस तीसरी ताकत का नेतृत्व कर रहा था। शीत युद्ध के दौर में भारत और पाकिस्तान दोनों ही किसी भी महाशक्ति के औपचारिक सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे।
अर्थ का बदलता स्वरूप
20वीं सदी के उत्तरार्ध में थर्ड वर्ल्ड शब्द का अर्थ राजनीति से हटकर आर्थिक स्थिति पर केंद्रित हो गया। इसे उन देशों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा जो औद्योगिक रूप से पिछड़े थे, गरीबी अधिक थी और बुनियादी ढांचा कमजोर था। धीरे-धीरे यह शब्द नकारात्मक और अपमानजनक माना जाने लगा। आज के कूटनीतिक दौर में ग्लोबल साउथ, विकासशील देश या लो और मिडल-इन्कम देश जैसे शब्द इसका विकल्प बन चुके हैं।
क्या भारत अब भी थर्ड वर्ल्ड देश है?
भारत का इतिहास बताता है कि शीत युद्ध के समय यह तीसरी दुनिया का हिस्सा था। लेकिन आज का भारत पूरी तरह बदल चुका है। देश दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और चौथी बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है। भारत अब लो-इनकम देशों की श्रेणी से बाहर आ चुका है।
हालांकि, देश में आर्थिक असमानता और गरीबी जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। लेकिन वैश्विक मंच पर भारत अब एक उभरती महाशक्ति के रूप में पहचाना जाता है।
पड़ोसी देशों की स्थिति
पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और अफगानिस्तान अभी भी विकासशील या कम विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं। पाकिस्तान आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिससे यह तकनीकी रूप से अब भी उन मानकों के करीब है जिन्हें कभी तीसरी दुनिया कहा गया। कूटनीतिक दृष्टि से पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देश अब ग्लोबल साउथ की श्रेणी में शामिल होने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
थर्ड वर्ल्ड की आधुनिक प्रासंगिकता
आज थर्ड वर्ल्ड शब्द केवल ऐतिहासिक और शैक्षिक संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। अर्थव्यवस्था, तकनीकी विकास और वैश्विक राजनीति में उभरते देशों की नई पहचान ने इस शब्द का अर्थ बदल दिया है। उभरते बाजार, वैश्विक निवेश और तकनीकी प्रगति के कारण देशों के लिए ग्लोबल साउथ और विकासशील देशों की नई परिभाषाएं बनी हैं।
थर्ड वर्ल्ड शब्द का जन्म राजनीतिक जरूरतों और शीत युद्ध की परिस्थितियों में हुआ। समय के साथ अर्थ बदल गया और अब यह शब्द आर्थिक पिछड़ापन नहीं, बल्कि विकासशील देशों की वैश्विक स्थिति को दर्शाने के लिए उपयोग में आता है। भारत अब आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से उभरती महाशक्ति बन चुका है। जबकि पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों के लिए यह शब्द अभी भी विकासशील देश के अर्थ में प्रासंगिक है।
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