ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
चीन में नियुक्त भारतीय राजदूतों और राजनयिकों के नाम बदलने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह कोई व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि भाषा, उच्चारण और कूटनीतिक जरूरत से जुड़ी
प्रक्रिया है।
खबर में बताया गया है कि जब भारतीय राजनयिक बीजिंग में तैनात होते
हैं, तो वे एक नया चीनी नाम अपनाते हैं।
इसका मकसद स्थानीय स्तर पर संवाद को आसान बनाना और सांस्कृतिक रूप
से स्वीकार्य पहचान के साथ काम करना होता है।
विक्रम दोरईस्वामी का उदाहरण
रिपोर्ट
में हाल ही में चीन में भारत के नवनियुक्त राजदूत विक्रम दोरईस्वामी का उदाहरण
दिया गया है।
खबर के मुताबिक उन्होंने अपना चीनी नाम वेई जियामेंग रखा है।
मैंडरिन भाषा में नामों का चुनाव ध्वनि और अर्थ के तालमेल के आधार
पर किया जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘वेई’ एक ऐतिहासिक उपनाम है, जबकि ‘जिया’ का अर्थ वृद्धि और ‘मेंग’ का अर्थ गठबंधन या संधि से जुड़ा
है।
इस तरह नाम केवल उच्चारण का मामला नहीं होता, बल्कि
उसमें अर्थ भी जोड़ा जाता है।
1950 के दशक से चली परंपरा
खबर के
मुताबिक चीनी नाम अपनाने की यह परंपरा नई नहीं है।
यह सिलसिला 1950 के दशक की शुरुआत से चला आ
रहा है, जब भारत ने चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए
थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि उस समय पहले भारतीय राजदूत को भी एक चीनी
नाम दिया गया था, जिसे ‘पैन एन जी’ के रूप में जाना गया।
तब से यह प्रक्रिया लगातार जारी है।
खबर में यह भी कहा गया है कि सिर्फ भारतीय ही नहीं, बल्कि कई दूसरे देशों के राजदूत, कारोबारी और
विद्वान भी चीन में स्थानीय भाषा के हिसाब से नाम अपनाते हैं।
भाषा और उच्चारण की वजह
रिपोर्ट
में इस परंपरा की सबसे बड़ी वजह चीनी भाषा की जटिलता को बताया गया है।
मैंडरिन को टोनल भाषा कहा गया है, यानी इसमें
ध्वनि और सुर के आधार पर शब्दों का अर्थ बदल जाता है।
विदेशी नामों का उच्चारण वहां के लोगों के लिए कठिन हो सकता है,
खासकर ऐसे नाम जिनके अक्षर चीनी फोनेटिक सिस्टम में आसानी से फिट
नहीं बैठते।
खबर के मुताबिक अगर मूल नाम ही इस्तेमाल किए जाएं, तो सरकारी बैठकों, मीडिया रिपोर्ट्स और आम बातचीत
में भ्रम पैदा हो सकता है।
इसी वजह से स्थानीय नाम अपनाने को व्यावहारिक उपाय माना जाता है।
सकारात्मक अर्थ और सांस्कृतिक स्वीकार्यता
रिपोर्ट
में कहा गया है कि चीन में नाम केवल पहचान के लिए नहीं होते, बल्कि वे व्यक्ति के गुण
और मूल्यों से भी जुड़े माने जाते हैं।
इसलिए राजदूतों के लिए नाम चुनते समय यह ध्यान रखा जाता है कि उसका
अर्थ सकारात्मक हो।
खबर में यह भी बताया गया है कि स्थानीय भाषा का नाम अपनाना वहां की
संस्कृति के प्रति सम्मान के रूप में देखा जाता है।
इससे स्थानीय लोगों के बीच सहजता और भरोसा बढ़ाने में मदद मिलती है।
दूसरे देशों में भी प्रचलन
रिपोर्ट
के मुताबिक नाम को स्थानीय ढांचे के अनुसार बदलने की परंपरा सिर्फ चीन तक सीमित
नहीं है।
जापान और कोरिया में भी विदेशी राजनयिक अपने नाम स्थानीय लिपि के
अनुसार लिखते हैं।
अरब देशों में नामों का उच्चारण अरबी लहजे के हिसाब से ढाला जाता है
और यूरोप में नामों को छोटा या अंग्रेजी शैली के करीब बनाया जाता है।
हालांकि चीन के मामले में यह प्रक्रिया ज्यादा व्यवस्थित बताई गई है,
जहां ध्वनि और अर्थ दोनों को साथ रखकर नाम चुना जाता है।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!