ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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दुनिया में जब भी बड़े युद्ध, मिसाइल हमले और महाशक्तियों की बयानबाजी बढ़ती है, तो एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की तरफ बढ़ रही है. इस समय मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव और रूस-यूक्रेन युद्ध मिलकर ऐसा माहौल बना रहे हैं, जहां World War 3 की चर्चा सोशल मीडिया से लेकर कूटनीतिक हलकों तक तेज हो चुकी है. हालांकि विशेषज्ञ अभी मौजूदा हालात को सीधा विश्व युद्ध नहीं मानते, लेकिन यह जरूर कहा जा रहा है कि एक नया global alignment बनता दिख रहा है.
विश्व युद्ध किसे कहा जाता है
डिफेंस एक्सपर्ट्स के अनुसार हर बड़ा संघर्ष विश्व युद्ध नहीं होता. किसी जंग को विश्व युद्ध तब माना जाता है, जब वह यूरोप, एशिया और अफ्रीका जैसे कई महाद्वीपों तक फैल जाए, महाशक्तियां सीधे आमने-सामने आ जाएं, और असर महीनों नहीं बल्कि सालों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल सप्लाई और समुद्री व्यापार पर पड़े. मौजूदा हालात गंभीर जरूर हैं, लेकिन अभी कई ताकतें सीधे भिड़ने के बजाय प्रॉक्सी वॉर के जरिए मुकाबला कर रही हैं.
यही वजह है कि अभी “विश्व युद्ध शुरू हो गया” कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन इतना जरूर है कि दुनिया में दो बड़े शक्ति समूह साफ नजर आने लगे हैं. यही बात नए वर्ल्ड ऑर्डर की चर्चा को और मजबूत करती है.
कौन किसके साथ दिख सकता है
अगर भविष्य में बड़ा युद्ध छिड़ता है, तो एक खेमा अमेरिका के नेतृत्व में दिख सकता है. इसमें नाटो के सदस्य देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी शामिल होंगे, जबकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया इस गुट की रीढ़ बन सकते हैं. मिडिल ईस्ट में इजराइल को भी इस ब्लॉक का मजबूत साथी माना गया है. ताइवान और यूक्रेन को भी इसी खेमे से समर्थन मिलने की संभावना बताई गई है.
दूसरी तरफ चीन और रूस के नेतृत्व में एक प्रतिद्वंद्वी धुरी की बात की जा रही है. इस ब्लॉक में उत्तर कोरिया, ईरान और बेलारूस जैसे देश शामिल हो सकते हैं, जबकि सीरिया और वेनेजुएला जैसे देश भी अपनी अमेरिका-विरोधी नीतियों के कारण इसी तरफ झुकते दिख सकते हैं. इस समूह का मकसद अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देना बताया गया है.
भारत की भूमिका सबसे दिलचस्प क्यों
इस पूरे समीकरण में भारत को सबसे बड़ा वाइल्डकार्ड कहा गया है. वजह यह है कि भारत के रूस के साथ पुराने रक्षा संबंध हैं, वहीं अमेरिका के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी भी मजबूत है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत पहले तटस्थ रहने की कोशिश करेगा और अपनी पुरानी गुटनिरपेक्ष सोच के करीब रहना चाहेगा.
हालांकि यह तस्वीर इतनी सरल भी नहीं है. चीन के साथ सीमा विवाद और राष्ट्रीय हितों की रक्षा जैसे मुद्दे भारत को किसी समय कठिन फैसला लेने की तरफ धकेल सकते हैं. इसी कारण कहा जा रहा है कि भारत की स्थिति किसी भी संभावित बड़े संघर्ष के नतीजे को प्रभावित कर सकती है.
असली लड़ाई विचारधारा की नहीं, संसाधनों की
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि संभावित तीसरे विश्व युद्ध में गठबंधन केवल लोकतंत्र बनाम तानाशाही के आधार पर नहीं बनेंगे. कई देश तेल, अनाज, तकनीक और आर्थिक जरूरतों के हिसाब से अपने पक्ष तय कर सकते हैं. अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई देश अपने हितों के आधार पर चीन या अमेरिका में से किसी एक तरफ जा सकते हैं.
यही बात आज की geopolitics को पहले से अलग बनाती है. अब सिर्फ ideology नहीं, बल्कि energy routes, trade access और survival needs भी देशों के फैसलों को तय कर रही हैं. इसलिए दुनिया के सामने असली चिंता केवल युद्ध नहीं, बल्कि उस युद्ध के पीछे काम कर रहे संसाधन और रणनीतिक हित भी हैं.
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