ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव के साथ उसके दुरुपयोग के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के शामली जिले से जुड़े चर्चित आयुष मलिक धर्मांतरण मामले में अब एक नया मोड़ आ गया है। पुलिस जांच में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो फर्जी और AI जनरेटेड पाया गया है। इस खुलासे के बाद न केवल मामले की जांच तेज हो गई है, बल्कि डीपफेक तकनीक के खतरे भी एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं।
क्या था वायरल वीडियो?
कुछ समय पहले शामली के एक व्यापारी के बेटे आयुष मलिक के कथित धर्मांतरण का मामला सामने आया था। इस मामले में पहले ही तीन लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। इसी बीच सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ, जिसमें आयुष मलिक जैसा दिखने वाला युवक खुद को "मोहम्मद अली" बताते हुए नजर आ रहा था। वीडियो में वह कह रहा था कि उसने अपनी इच्छा से इस्लाम स्वीकार किया है और उस पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनाया गया। यह वीडियो कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से फैलाया गया और दर्जनों अकाउंट्स से शेयर किया गया।
दूसरी वीडियो में सामने आई कथित बहन
पहले वीडियो के बाद एक और वीडियो वायरल हुआ। इसमें एक युवती ने खुद को आयुष मलिक की बहन बताते हुए दावा किया कि उसके भाई को अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा है। वीडियो में युवती ने धर्म को व्यक्तिगत पसंद का विषय बताते हुए मामले को लेकर कई बातें कहीं। लेकिन बाद में यह दावा भी सवालों के घेरे में आ गया।
पिता ने किया दावों का खंडन
जब यह वीडियो आयुष के पिता देवराज मलिक तक पहुंचा तो वे हैरान रह गए। उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया कि वीडियो में दिखाई देने वाली लड़की उनकी बेटी नहीं है। देवराज मलिक ने बताया कि उनकी केवल एक बेटी है, जिसकी शादी हो चुकी है और वह नोएडा में रहती है। उन्होंने कहा कि वीडियो में दावा करने वाली युवती का उनके परिवार से कोई संबंध नहीं है। इसके बाद उन्होंने पूरे मामले की शिकायत पुलिस से की और जांच की मांग की।
पुलिस जांच में सामने आई सच्चाई
एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की साइबर जांच शुरू की। जांच के दौरान पता चला कि आयुष का वायरल वीडियो वास्तव में AI तकनीक की मदद से तैयार किया गया था। पुलिस के अनुसार, यह वीडियो महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र से सोशल मीडिया पर अपलोड किया गया था। जांच में यह भी सामने आया कि जिस इंस्टाग्राम अकाउंट से वीडियो पोस्ट हुआ था, वह एक धार्मिक व्यक्ति से जुड़ा बताया जा रहा है। इसके बाद पुलिस ने वीडियो को आगे फैलाने वाले कई सोशल मीडिया अकाउंट्स की भी पहचान शुरू कर दी।
कई सोशल मीडिया अकाउंट जांच के दायरे में
जांच एजेंसियों के अनुसार, 50 से अधिक सोशल मीडिया हैंडल्स ने इस वीडियो को अलग-अलग रूप में साझा किया। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वीडियो तैयार करने और प्रसारित करने में किन-किन लोगों की भूमिका रही। यूपी पुलिस की एक टीम जांच के सिलसिले में महाराष्ट्र भी पहुंची है। मामले में कई लोगों से पूछताछ की जा रही है।
कथित बहन ने भी मांगी माफी
पुलिस जांच और बढ़ती सख्ती के बाद खुद को आयुष की बहन बताने वाली युवती ने भी एक नया वीडियो जारी किया। इसमें उसने स्वीकार किया कि उसका आयुष या उसके परिवार से कोई संबंध नहीं है। उसने अपने पहले के दावों के लिए माफी मांगते हुए कहा कि वह आयुष के परिवार को नहीं जानती।
क्या होता है डीपफेक?
डीपफेक एक ऐसी तकनीक है जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज और हावभाव इस तरह तैयार किए जाते हैं कि वीडियो बिल्कुल असली जैसा दिखाई देता है। यही वजह है कि आम लोगों के लिए ऐसे वीडियो की सच्चाई पहचानना बेहद मुश्किल हो जाता है।
डीपफेक का बढ़ता खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल पहले भी फर्जी विज्ञापन, निवेश घोटालों, धोखाधड़ी और पहचान छिपाने जैसे मामलों में किया जाता रहा है। हालांकि इस मामले ने यह दिखाया है कि AI तकनीक का इस्तेमाल संवेदनशील सामाजिक और धार्मिक मुद्दों में भी किया जा सकता है, जिससे भ्रम और तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है।
आयुष मलिक मामले में वायरल वीडियो के फर्जी साबित होने से यह साफ हो गया है कि डिजिटल युग में किसी भी वीडियो या सूचना पर आंख मूंदकर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। पुलिस मामले की जांच कर रही है और दोषियों की पहचान की कोशिश जारी है। यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि AI और डीपफेक तकनीक जितनी उपयोगी है, उसका गलत इस्तेमाल समाज के लिए उतना ही बड़ा खतरा भी बन सकता है।
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