ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने पटना हाई कोर्ट के उस फैसले पर गंभीर चिंता जताई है, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती दबाना अपने आप में 'रेप की कोशिश' (Attempt to Rape) नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह इस फैसले की समीक्षा करेगा और इस संबंध में विस्तृत आदेश जारी करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे, ने मामले की सुनवाई के दौरान पटना हाई कोर्ट के फैसले पर चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि इस मामले की समीक्षा की जाएगी और जल्द ही विस्तृत आदेश जारी किया जाएगा।
कैसे पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट?
यह मुद्दा उस समय सुप्रीम कोर्ट के सामने आया जब एक वकील ने सुनवाई के दौरान पटना हाई कोर्ट के फैसले की जानकारी अदालत को दी। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट पहले से इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित फैसले पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर सुनवाई कर रहा था। उसी दौरान पटना हाई कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया गया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर भी विवाद
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना, उसके पजामे का नाड़ा खोलना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना स्वतः 'रेप की कोशिश' के दायरे में नहीं आता। इस फैसले के बाद देशभर में कानूनी और सामाजिक स्तर पर बहस छिड़ गई थी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई शुरू की।
नई गाइडलाइंस का पालन करने का निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार की गई न्यायिक संवेदनशीलता संबंधी गाइडलाइंस को मंजूरी दे दी। साथ ही देश की सभी अदालतों को निर्देश दिया गया कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान इन गाइडलाइंस का सख्ती से पालन किया जाए।
न्यायिक संवेदनशीलता पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी को निर्देश दिया था कि वह भारत की सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यापक गाइडलाइंस तैयार करे, जिनसे यौन अपराधों के मामलों की सुनवाई अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित तरीके से हो सके। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि ये दिशानिर्देश भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए और केवल विदेशी कानूनों की नकल नहीं होने चाहिए।
पटना हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण और संवेदनशीलता पर चर्चा तेज कर दी है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत आदेश पर होगी, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों की कानूनी व्याख्या और न्यायिक प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण असर पड़ सकता है।
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