ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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हीलियम गैस को अक्सर हम सिर्फ गुब्बारों में इस्तेमाल होने वाली हल्की गैस के रूप में जानते हैं, लेकिन असलियत में यह आधुनिक विज्ञान और तकनीक की रीढ़ है। मेडिकल से लेकर स्पेस टेक्नोलॉजी तक, कई अहम क्षेत्रों में हीलियम की भूमिका बेहद जरूरी है। आज के समय में हीलियम की कमी और बढ़ती कीमतों ने दुनिया भर में चिंता बढ़ा दी है। खासकर मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने इसकी सप्लाई पर सीधा असर डाला है, जिससे वैश्विक स्तर पर संकट गहराता जा रहा है।
युद्ध और सप्लाई चेन पर असर
मध्य पूर्व में जारी तनाव ने ग्लोबल लॉजिस्टिक्स को प्रभावित किया है। इस बार असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि हीलियम जैसी दुर्लभ गैस भी इसकी चपेट में आ गई है। युद्ध के कारण सप्लाई चेन बाधित हो रही है, जिससे हीलियम की उपलब्धता कम हो रही है। इसका असर उन सभी देशों पर पड़ रहा है जो तकनीकी जरूरतों के लिए इस गैस पर निर्भर हैं।
किसके पास है हीलियम का सबसे बड़ा भंडार?
दुनिया में हीलियम उत्पादन की बात करें तो अमेरिका इस क्षेत्र में सबसे आगे है। अकेले अमेरिका दुनिया की 40 प्रतिशत से ज्यादा हीलियम की जरूरत पूरी करता है। इसके पीछे कारण है वहां मौजूद प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार, जिनसे हीलियम उप-उत्पाद के रूप में निकाली जाती है। अमेरिका के बाद कतर और रूस भी हीलियम उत्पादन में शामिल हैं, लेकिन उनका योगदान अभी भी अमेरिका से काफी कम है।
भारत की स्थिति: आयात पर भारी निर्भरता
भारत के लिए यह स्थिति थोड़ी चिंताजनक है, क्योंकि देश में हीलियम का उत्पादन लगभग न के बराबर है। भारत हर साल करीब 65.66 मिलियन क्यूबिक मीटर हीलियम का उपयोग करता है, जिसके लिए उसे विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस आयात पर हर साल करीब 55,000 करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा बोझ डालता है।
तकनीक और चिकित्सा में अहम भूमिका
हीलियम का उपयोग कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में होता है।
• मेडिकल क्षेत्र: MRI मशीनों को ठंडा रखने के लिए तरल हीलियम जरूरी है।
• स्पेस टेक्नोलॉजी: रॉकेट लॉन्चिंग में इसका इस्तेमाल होता है।
• न्यूक्लियर रिएक्टर: इन्हें ठंडा करने में हीलियम काम आता है।
• इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री: सेमीकंडक्टर चिप्स के निर्माण में इसकी अहम भूमिका होती है।
इन सभी क्षेत्रों में हीलियम की कमी सीधे विकास को प्रभावित कर सकती है।
भारत की आत्मनिर्भरता की ओर कदम
भारत अब इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है। आईआईटी बॉम्बे ने हाल ही में एक ऐसी सुविधा शुरू की है, जहां प्रति घंटे करीब 56 लीटर तरल हीलियम तैयार किया जा सकता है। हालांकि यह मात्रा देश की जरूरतों के मुकाबले कम है, लेकिन रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए यह एक बड़ा कदम है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी तकनीक और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ध्यान देना होगा, ताकि विदेशी निर्भरता कम की जा सके।
भारत में छिपे हैं बड़े भंडार
अच्छी बात यह है कि भारत में हीलियम के प्राकृतिक स्रोत मौजूद हैं। झारखंड के राजमहल ज्वालामुखी बेसिन में हीलियम के बड़े भंडार होने की संभावना जताई गई है। इसके अलावा देश में करीब 150 गर्म पानी के कुंड ऐसे हैं, जहां से हीलियम प्राप्त की जा सकती है। अगर इन स्रोतों का सही तरीके से दोहन किया जाए, तो भारत आने वाले समय में आत्मनिर्भर बन सकता है।
हीलियम गैस भले ही दिखने में साधारण लगे, लेकिन इसका महत्व बेहद बड़ा है। वैश्विक तनाव और सप्लाई संकट ने यह साफ कर दिया है कि इस गैस पर निर्भरता कम करना जरूरी है। भारत के पास संसाधन भी हैं और संभावनाएं भी। जरूरत है सही तकनीक, निवेश और रणनीति की, ताकि देश इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके।
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