ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब भारत की घरेलू राजनीति में भी साफ दिखाई देने लगा है, और इसी कड़ी में गाजीपुर से सांसद अफजाल अंसारी का बयान चर्चा का विषय बन गया है. उन्होंने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत ने ईरान जैसे पुराने मित्र देश से दूरी बना ली है और अब सरकार का रुख लोगों को उलझन में डाल रहा है. उनके बयान में सबसे ज्यादा चर्चा उस बात की हुई, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा इजराइल को “फादरलैंड” कहे जाने पर आपत्ति जताई. अफजाल अंसारी ने इसे सिर्फ शब्दों का मामला नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति की दिशा से जुड़ा बड़ा संकेत बताया.
ईरान को लेकर क्या कहा गया
अफजाल अंसारी का कहना है कि ईरान लंबे समय तक ऐसे मौकों पर भारत के साथ खड़ा रहा, जब पाकिस्तान और कश्मीर जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बन सकता था. उन्होंने कहा कि इस्लामी देशों की बैठकों में ईरान ने कई बार भारत के पक्ष को मजबूती दी और कोई ऐसा प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ने दिया, जो भारत के खिलाफ जाता. ऐसे में उनका आरोप है कि भारत ने अपने एक भरोसेमंद दोस्त को धीरे-धीरे खो दिया है. यह बात इसलिए भी अहम मानी जा रही है, क्योंकि पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच भारत के रिश्तों पर लगातार नजर रखी जा रही है.
अमेरिका और इजराइल पर तीखी टिप्पणी
अफजाल अंसारी ने अपने बयान में अमेरिका पर भी सीधा निशाना साधा. उन्होंने कहा कि अमेरिका बार-बार भारत को अपमानित करता है, लेकिन सरकार उसके सामने मजबूती से खड़ी होती नहीं दिख रही. उन्होंने यह भी कहा कि फिलिस्तीन और ईरान में हो रही हिंसा को देखकर खुशी का माहौल नहीं हो सकता, क्योंकि उनके मुताबिक बड़ी ताकतें मानवता की कीमत पर राजनीति कर रही हैं. इस तरह उनका पूरा बयान सिर्फ एक देश के समर्थन या विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर दिए.
पुराने नेताओं से तुलना क्यों अहम है
अपने हमले को और तेज करते हुए अफजाल अंसारी ने कहा कि भारत की पिछली सरकारों ने अमेरिका की दादागीरी को इस तरह स्वीकार नहीं किया था. उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे पुराने नेताओं का नाम लेते हुए कहा कि पहले भारत अपनी गरिमा के साथ खड़ा होता था. उनके मुताबिक आज स्थिति ऐसी बन गई है, जहां अमेरिका के रवैये पर खुलकर जवाब देने के बजाय नरमी दिखाई जा रही है. यही वजह है कि उनका बयान केवल विपक्षी हमला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान बनाम कूटनीतिक झुकाव की बहस के रूप में भी देखा जा रहा है.
राजनीति में इसका असर
इस बयान का सीधा असर उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी देखा जा सकता है, क्योंकि विदेश नीति जैसे विषय आमतौर पर राज्य स्तरीय नेताओं के भाषणों में कम दिखते हैं. लेकिन जब कोई सांसद इस तरह ईरान, इजराइल, अमेरिका और भारत के रिश्तों को जोड़कर बात करता है, तो वह अपने समर्थकों के बीच एक बड़ा वैचारिक संदेश देने की कोशिश भी करता है. अफजाल अंसारी ने किसानों और देश के सम्मान जैसे मुद्दों को भी अपने बयान से जोड़ा, जिससे साफ है कि उनका लक्ष्य केवल अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि जनता के भीतर एक भावनात्मक राजनीतिक बहस खड़ी करना भी था. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सत्ता पक्ष इस तरह की आलोचना का जवाब विदेश नीति के तर्क से देता है या इसे सिर्फ चुनावी बयानबाजी मानकर छोड़ देता है.
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