ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
जब कोई फिल्म किसी विवादित या चर्चित शख्सियत से मिलता-जुलता किरदार दिखाती है, तो मामला सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता। हाल ही में एक फिल्म में ऐसे किरदार को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया, जिसे माफिया अतीक अहमद से जोड़कर देखा जा रहा है। इस पर समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद एसटी हसन ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि ऐसी फिल्मों का मकसद समाज में बहस से ज्यादा तनाव पैदा करना लगता है।
विवाद की जड़ क्या है
रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म में एक किरदार “आतिफ अहमद” नाम से दिखाया गया है, जिसे अतीक अहमद से जुड़ा हुआ माना जा रहा है, और इसी कथित प्रस्तुतीकरण पर विवाद बढ़ा है। एसटी हसन ने कहा कि इस तरह की कहानी और उसका प्रस्तुतिकरण समाज में गलत संदेश देता है।
असल बात यही है कि जब फिल्मों में अपराध, धर्म और सीमा पार एजेंसियों जैसी चीजें एक साथ दिखाई जाती हैं, तो दर्शक उसे सिर्फ कहानी नहीं मानते। कई लोग उसे असल समाज से जोड़कर देखते हैं, और यहीं से सियासी प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है।
एसटी हसन ने क्या कहा
एसटी हसन ने कहा कि ऐसी फिल्मों के जरिए जानबूझकर विवाद खड़ा किया जाता है ताकि लोगों की दिलचस्पी बढ़े और फिल्म को फायदा मिले। उनका कहना था कि जैसे ही किसी फिल्म पर बहस या विवाद शुरू होता है, लोग उसे देखने के लिए और ज्यादा उत्सुक हो जाते हैं और इससे फिल्म की कमाई बढ़ती है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि फिल्मों के जरिए नफरत का माहौल बनाया जा रहा है और समाज के ताने-बाने को कमजोर करने वाली बातें परोसी जा रही हैं। उनके मुताबिक पहले फिल्में भाईचारे और सौहार्द का संदेश देती थीं, लेकिन अब नफरत का माहौल ज्यादा दिखाया जा रहा है।
फिल्म और राजनीति का रिश्ता
यह पहली बार नहीं है जब किसी फिल्म पर राजनीतिक बयान आए हों। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई फिल्में आईं जिन पर इतिहास, धर्म, राष्ट्रवाद या अपराध की प्रस्तुति को लेकर बहस छिड़ी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब सोशल मीडिया के कारण ये विवाद और तेजी से फैलते हैं।
कई बार फिल्म बनाने वाले कहते हैं कि वे सिर्फ कहानी दिखा रहे हैं, जबकि विरोध करने वाले कहते हैं कि कहानी के नाम पर समाज को बांटने की कोशिश हो रही है। इसी खींचतान में फिल्म का प्रचार भी हो जाता है और विवाद भी गहरा जाता है।
दर्शक क्यों खिंचते हैं ऐसी फिल्मों की तरफ
एसटी हसन की बात का एक हिस्सा यह भी है कि विवाद खुद फिल्म को बाजार देता है। यह बात पूरी तरह नई नहीं है। जब किसी फिल्म पर हंगामा होता है तो लोग यह जानने के लिए थिएटर या ओटीटी की तरफ जाते हैं कि आखिर मामला क्या है।
यानी विरोध और प्रचार कई बार एक-दूसरे के उलट नहीं, बल्कि साथ-साथ चलने लगते हैं। यही वजह है कि सियासत में बैठे लोग भी अब फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन नहीं मानते, बल्कि एक असरदार राजनीतिक-सामाजिक माध्यम की तरह देखते हैं।
असली सवाल क्या है
इस पूरे विवाद का असली सवाल यह नहीं कि फिल्म चलेगी या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या आज की फिल्में समाज को समझाने का काम कर रही हैं या सिर्फ भावनाएं भड़काकर ध्यान खींच रही हैं। एसटी हसन ने इसी बिंदु पर सवाल उठाया है।
उनकी प्रतिक्रिया से साफ है कि आने वाले समय में फिल्मों की राजनीतिक व्याख्या और बढ़ सकती है। क्योंकि जब पर्दे पर अपराध, धर्म और सियासत एक साथ दिखते हैं, तो बहस सिर्फ सिनेमाघर तक नहीं रहती—वह सीधे समाज और चुनावी माहौल तक पहुंच जाती है।
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