अयोध्या गोलीकांड की बहस फिर तेज, पुराने आरोपों पर आया नया जवाब
कारसेवकों पर गोली चलने के पुराने मामले को लेकर फिर सियासत गर्म है। जानिए आरोप क्या हैं, जवाब में क्या कहा गया और इस विवाद का राजनीतिक असर क्या हो सकता है।
अयोध्या गोलीकांड की बहस फिर तेज, पुराने आरोपों पर आया नया जवाब
  • Category: उत्तर प्रदेश

अयोध्या से जुड़ा एक पुराना और बेहद संवेदनशील मुद्दा एक बार फिर राजनीति के केंद्र में आ गया है।

कारसेवकों पर गोली चलने की घटना को लेकर लगातार आरोप लगाए जाते रहे हैं और अब इस पर फिर से बयानबाजी तेज हो गई है।
यही वजह है कि इतिहास, प्रशासन और राजनीति तीनों एक साथ इस बहस में खड़े दिखाई दे रहे हैं।

समाजवादी खेमे की ओर से यह आरोप लंबे समय से दोहराया जाता रहा है कि उस दौर की प्रशासनिक भूमिका पर जवाब दिया जाना चाहिए।
इसी संदर्भ में जब पूर्व शीर्ष अधिकारी और राम मंदिर निर्माण समिति से जुड़े नृपेंद्र मिश्रा से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने सीधे तौर पर अपनी बात रखी।
उनका जवाब सिर्फ निजी सफाई नहीं था, बल्कि सत्ता और प्रशासन के रिश्ते पर भी एक बड़ा संकेत देता है।

फैसले कौन करता है

नृपेंद्र मिश्रा ने कहा कि इस तरह के फैसले प्रमुख सचिव स्तर पर नहीं लिए जाते।
उनके मुताबिक ऐसे निर्णय 90 प्रतिशत राजनीतिक होते हैं, जबकि करीब 10 प्रतिशत राय गृह सचिवों और डीजीपी जैसे प्रशासनिक अधिकारियों की होती है।
इस एक वाक्य ने पूरे विवाद का फोकस बदल दिया, क्योंकि इससे जिम्मेदारी का केंद्र प्रशासन से हटकर राजनीतिक नेतृत्व की ओर जाता दिखा।

उन्होंने यह भी कहा कि वह उस समय सचिव थे और मुलायम सिंह यादव की सरकार में काम कर चुके थे।
यह बात उन्होंने ऐसे समय कही, जब उन पर व्यक्तिगत तौर पर आरोप लगाए जा रहे थे।
यानी उनका साफ संकेत था कि पद पर होना और अंतिम निर्णय लेना, दोनों अलग बातें हैं।

बाबरी काल का भी हुआ जिक्र

पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने एक और अहम बात कही, जिसने बहस को और गहरा कर दिया।
उन्होंने कहा कि बड़े फैसलों में प्रशासन की भूमिका सीमित होती है और मुख्य फैसला राजनीतिक स्तर पर होता है।
इसके साथ उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय की एक फाइल का जिक्र करते हुए कहा कि कार्रवाई के लिए तैयार फाइल को तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने वापस कर दिया था और कारसेवकों पर गोली न चलाने का फैसला लिया गया था।

यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि इससे दो अलग-अलग दौरों के फैसलों को लेकर नई चर्चा शुरू हो सकती है।
एक तरफ 1990 की गोलीबारी का सवाल है, दूसरी तरफ बाद के घटनाक्रम में गोली न चलाने का निर्णय सामने आता है।
इससे साफ होता है कि अयोध्या का मुद्दा सिर्फ आस्था या इतिहास का नहीं, बल्कि राजनीतिक फैसलों की जिम्मेदारी का भी सवाल है।

राजनीति में यादें कभी पुरानी नहीं होतीं

अयोध्या का नाम आते ही लोगों की भावनाएं, पुरानी यादें और राजनीतिक पहचान सब साथ में सामने आ जाती हैं।
इसी कारण यहां से जुड़ा कोई भी बयान सिर्फ बयान नहीं रहता, वह सीधे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाता है।
जब चुनावी माहौल या सियासी तनाव बढ़ता है, तब ऐसे मुद्दे फिर से केंद्र में आना और भी आसान हो जाता है।

अखिलेश यादव की ओर से लगाए जा रहे आरोपों के बीच आया यह जवाब बताता है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और उछाला जा सकता है।
विपक्ष इसे जवाबदेही के सवाल से जोड़ सकता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक आरोप बताकर खारिज करने की कोशिश करेगा।
यानी यह मामला सिर्फ अतीत का नहीं, वर्तमान की राजनीति का भी हथियार बन चुका है।

जनता क्या देख रही है

सामान्य लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने बड़े फैसलों की जिम्मेदारी आखिर तय कैसे होती है।
क्या प्रशासन सिर्फ सलाह देता है और अंतिम फैसला राजनीति करती है, या फिर दोनों की भूमिका मिलकर तय होती है, यही बहस का असली केंद्र है।
नृपेंद्र मिश्रा के बयान ने इस सवाल को और साफ तौर पर जनता के सामने ला दिया है।

फिलहाल इतना तय है कि अयोध्या से जुड़ा यह मुद्दा फिर शांत होने वाला नहीं दिखता।
पुराने आरोप, नई सफाई और राजनीतिक प्रतिक्रिया मिलकर इसे आने वाले समय में और बड़ा बना सकते हैं।
ऐसे में यह बहस सिर्फ इतिहास जानने की नहीं, सत्ता में जिम्मेदारी समझने की भी है।

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