यूपी में ओवैसी की नई चाल? पल्लवी पटेल वाला प्रयोग फेल, अब बसपा से गठबंधन की चर्चा
उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल तेज है। ओवैसी की पार्टी की पिछली रणनीतियां, 2017-2022 का प्रदर्शन, 2024 में पल्लवी पटेल के साथ समझौते का असर और अब बसपा के साथ संभावित गठबंधन—सब पर आसान भाषा में पढ़ें।
यूपी में ओवैसी की नई चाल? पल्लवी पटेल वाला प्रयोग फेल, अब बसपा से गठबंधन की चर्चा
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उत्तर प्रदेश में चुनाव जैसे-जैसे पास आते हैं, वैसे-वैसे हर पार्टी अपनी नई रणनीति बनाने में लग जाती है। इस बार चर्चा सिर्फ बीजेपी, सपा-कांग्रेस या बसपा की नहीं हो रही, बल्कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी की गतिविधियां भी लोगों का ध्यान खींच रही हैं। ओवैसी की पार्टी लगातार यह संकेत देती रही है कि वह यूपी में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। सवाल यह है कि क्या इस बार वह अकेले दम पर उतरेंगे या किसी बड़े गठबंधन के सहारे अपनी राजनीति को नया मोड़ देंगे?

यूपी में ओवैसी का पुराना रिकॉर्ड

अगर यूपी में ओवैसी की पार्टी के चुनावी इतिहास पर नजर डालें, तो तस्वीर बहुत मजबूत नहीं दिखती। पार्टी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन ज्यादातर जगह उसका असर सीमित रहा। पश्चिम उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बहुल सीटों पर भी पार्टी उम्मीद के मुताबिक जगह नहीं बना पाई। यही वजह है कि बाद के चुनावों में पार्टी ने कभी ज्यादा सीटों पर लड़ने की कोशिश की, तो कभी सीधे किसी मोर्चे या समझौते के जरिए मैदान में रहने का रास्ता चुना।

2022 में भी पार्टी ने ज्यादा सीटों पर किस्मत आजमाई, लेकिन वोट शेयर बहुत कम रहा। इस तरह लगातार दो चुनावों के बाद पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रही कि यूपी जैसे बड़े राज्य में सिर्फ भाषण और मौजूदगी से वोट बैंक नहीं बनता, इसके लिए स्थानीय नेतृत्व, संगठन और मजबूत गठबंधन की जरूरत होती है।

2024 में पल्लवी पटेल के साथ प्रयोग क्यों फेल हुआ?

लोकसभा चुनाव 2024 में ओवैसी की पार्टी ने एक अलग रास्ता चुना। उस समय दावा था कि एक नया राजनीतिक मोर्चा खड़ा किया गया, जिसमें पिछड़ा-दलित-मुस्लिम की बात सामने आई। इसी क्रम में ओवैसी ने अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल के उम्मीदवारों को समर्थन दिया। उम्मीद थी कि यह तालमेल कुछ सीटों पर असर दिखाएगा। लेकिन नतीजा शून्य रहा। वोट प्रतिशत भी बहुत कम रहा और सीट कोई नहीं आई।

यहां से एक बात साफ निकलती है—सिर्फ समर्थन दे देने से वोट ट्रांसफर अपने आप नहीं होता। यूपी में वोटर कई बार जाति, क्षेत्र, स्थानीय चेहरा और जीतने की संभावना देखकर फैसला करता है। अगर गठबंधन जमीन पर मजबूत न हो, तो सोशल मीडिया या मंचों पर दिखाई देने वाली दोस्ती चुनाव में फायदा नहीं दिलाती।

अब बसपा के साथ गठबंधन की चर्चा क्यों?

अब खबरों में यह चर्चा है कि ओवैसी की पार्टी यूपी में बसपा के साथ तालमेल कर सकती है। इसकी वजह भी समझ में आती है। बसपा का अपना एक पुराना वोट बेस रहा है और दलित वोटों में उसका प्रभाव आज भी कई इलाकों में देखा जाता है। वहीं ओवैसी की पार्टी मुस्लिम वोटों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है। अगर दोनों साथ आते हैं, तो विचार यह हो सकता है कि एक नया “कॉम्बिनेशन” बनाकर सपा-कांग्रेस और बीजेपी दोनों को चुनौती दी जाए।

लेकिन एक दूसरा पहलू भी है। बसपा हाल के वर्षों में पहले जैसी ताकत के साथ मैदान में नहीं दिखी। लोकसभा चुनाव में बसपा का वोट शेयर तो रहा, पर सीट नहीं मिली। विधानसभा में भी उसका प्रतिनिधित्व सीमित है। ऐसे में सवाल उठता है कि बसपा और ओवैसी साथ आकर कितना बड़ा बदलाव ला पाएंगे? राजनीतिक जानकारों का एक हिस्सा यही मानता है कि इस गठबंधन से “बड़े जादू” की उम्मीद फिलहाल कम है।

वोटर के मन में सबसे बड़ा सवाल: फायदा किसे?

अगर बसपा-ओवैसी गठबंधन होता है, तो सबसे पहले यह देखना होगा कि वोटर इसे कैसे लेता है। यूपी में जातीय और धार्मिक समीकरणों की अपनी जटिलता है। दलित वोटर का एक हिस्सा अलग सोचता है, मुस्लिम वोटर का एक हिस्सा अलग। फिर क्षेत्र के हिसाब से मुद्दे बदल जाते हैं—कहीं रोजगार, कहीं कानून-व्यवस्था, कहीं किसान, कहीं स्थानीय समीकरण। ऐसे में गठबंधन की सफलता सिर्फ “घोषणा” से नहीं होगी, उसे मैदान में साबित करना पड़ेगा।

दूसरी बात, यूपी के चुनाव में सीटों का गणित भी बड़ा क्रूर होता है। कई सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी रहता है। वहां तीसरे या चौथे विकल्प के तौर पर वोट कटने का खतरा ज्यादा रहता है। अगर गठबंधन सही तरह से रणनीति नहीं बनाता, तो नुकसान भी हो सकता है।

2027 की तैयारी: संगठन बनाम प्रतीक राजनीति

आने वाले समय में ओवैसी की पार्टी के लिए सबसे जरूरी काम संगठन को मजबूत करना होगा। यूपी में सिर्फ बड़े नेता की रैली कर देने से काम नहीं चलेगा। बूथ स्तर तक टीम चाहिए, स्थानीय चेहरे चाहिए, और लगातार लोगों से जुड़ाव चाहिए। 2017 और 2022 के अनुभव यही बताते हैं कि सिर्फ चुनाव के समय जोर लगाने से पार्टी की पकड़ नहीं बनती।

बसपा के लिए भी यह समय निर्णायक है। अगर वह अकेले उतरती है, तो उसे अपनी पुरानी कोर टीम और कैडर को फिर से सक्रिय करना होगा। और अगर वह गठबंधन का रास्ता चुनती है, तो उसे अपने वोटर को भरोसा दिलाना होगा कि यह समझौता सिर्फ चुनावी मजबूरी नहीं, बल्कि सोच-समझकर किया गया फैसला है।

आगे क्या?

फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यूपी में इस बार कई छोटे-बड़े गठबंधनों की चर्चा तेज रहेगी। ओवैसी की पार्टी अगर बसपा के साथ आती है, तो यह यूपी की राजनीति में एक नया संदेश जरूर होगा। पर “नई चर्चा” और “नई सरकार” के बीच का रास्ता बहुत लंबा होता है। चुनाव के नतीजे तय करेंगे कि यह प्रयोग सिर्फ सुर्खियों तक सीमित रहा या सच में जमीन पर कुछ बदल पाया।

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