ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन सियासी हलचल अपने चरम पर पहुंच चुकी है। खासकर महिला वोट बैंक और जातीय समीकरण इस बार राजनीति के केंद्र में हैं। हर राजनीतिक दल अपनी रणनीति के जरिए अलग-अलग वर्गों को साधने में जुटा हुआ है।
महिला राजनीति बनी बड़ा मुद्दा
इन दिनों यूपी की राजनीति में “आधी आबादी” यानी महिलाओं को लेकर खास फोकस देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में महिला पदयात्रा की अगुआई की। इस दौरान उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण का संदेश देने की कोशिश की। इस पदयात्रा में ओपी राजभर की मौजूदगी भी खास रही, जो बीजेपी के साथ खड़े नजर आए। इससे यह साफ संकेत गया कि बीजेपी महिला और पिछड़ी जातियों दोनों को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।
सपा का ‘डबल स्ट्राइक’ दांव
वहीं दूसरी ओर अखिलेश यादव ने भी रणनीतिक चाल चलते हुए एक तीर से दो निशाने साधे। उन्होंने जूही सिंह की जगह सीमा राजभर को महिला सभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर बड़ा संदेश दिया। यह फैसला सिर्फ महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके जरिए सपा ने राजभर समाज को भी साधने की कोशिश की। साथ ही ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को मजबूत करने का संकेत भी दिया गया।
राजभर वोट बैंक का महत्व
पूर्वांचल की राजनीति में राजभर समाज की अहम भूमिका मानी जाती है। करीब 4% आबादी होने के बावजूद यह समुदाय 20 से ज्यादा जिलों में चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है। ओम प्रकाश राजभर, जो पहले सपा के साथ थे, अब एनडीए का हिस्सा बन चुके हैं और मंत्री भी हैं। ऐसे में दोनों दलों के लिए यह वोट बैंक बेहद अहम हो गया है।
बीजेपी vs सपा: सियासी तकरार
बीजेपी लगातार यह दावा कर रही है कि राजभर समाज उसके साथ है। वहीं सपा सीमा राजभर को आगे लाकर यह दिखाना चाहती है कि वह भी इस वर्ग की हितैषी है। बीजेपी ने इस मुद्दे को धार्मिक एंगल से जोड़ते हुए सपा पर निशाना साधा और कहा कि राजभर समाज कभी ऐसे लोगों के साथ नहीं जाएगा जो सालार मसूद को मानते हैं। इस बयानबाजी ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है।
अब सवाल यही है कि महिला सशक्तिकरण और जातीय समीकरणों के इस खेल में कौन आगे निकलता है। सपा का पीडीए फॉर्मूला और बीजेपी की सामाजिक इंजीनियरिंग—दोनों ही अपने-अपने तरीके से वोटरों को लुभाने में जुटे हैं। आने वाले समय में यह साफ होगा कि इन रणनीतियों का कितना असर पड़ता है, लेकिन इतना तय है कि यूपी की राजनीति में इस बार महिला और जातीय मुद्दे निर्णायक भूमिका निभाने वाले हैं
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